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मैं शहरों को देखकर कभी मुस्कुरा नहीं सका!

आज से क़रीब दस महीने पहले मैं दूसरी बार दिल्ली की ओर आया। दिल्ली के किनारे, नोएडा को ठिकाना बनाया। जब मैं आया तब मेरे पास शब्दों का एक बड़ा-सा गोदाम था। इस गोदाम से मैं शब्द निकालता, उसे वाक्य बनाता और फिर उसे अपने तरह इस्तेमाल करता। इस गोदाम से कई शब्द मैं बार-बार निकालता था। फिर मैं इन शब्दों का इस्तेमाल सबसे ज़्यादा गालियों में करता और उसके बाद अपनी प्रेमिका की तारीफ़ में।

मेरे पास हमेशा सुंदर शब्दों का गुच्छा मौजूद रहता था। जिसे मैंने कई कवियों की कविताओं से जबरन खींचकर जुटाया था और कुछ शब्दों को हासिल किया था— कहानियों, उपन्यासों या आम बोलचाल से। लेकिन जब से दिल्ली की ओर आया, मेरे ज़ेहन के गोदाम से शब्द ग़ायब होने लगे थे। कुछ शब्द तो उसी गोदाम में सड़ गए। इसका सीधा-साफ़ कारण था—इस महान् और विशाल शहर में, मैं उनका प्रयोग कर नहीं पा रहा था। सड़ने वाले ये कुछ शब्द थे : आराम, स्वाद, नींद, नदी, खेत, घर, पेड़, चिड़िया...

और यहाँ कुछ शब्द ऐसे भी थे, जिनका प्रयोग मैंने इस हिसाब से किया था कि वे शब्द घिसते-घिसते अर्थ खो चुके थे : किराया, मेल, इस्तीफ़ा, जॉइनिंग, टिफ़िन, अप्रेज़ल, ऑर्डर...

मैं अपने चेहरे पर रोज़ किसी न किसी कंपनी का फ़ेस वॉश लेपता हूँ। उससे बहुत सारा सफ़ेद झाग पैदा होता है। फ़ेस वॉश अपने चेहरे पर लेपते हुए, मैं अपनी आँख बचाने की कोशिश करता हूँ। लेकिन झाग से आँख बच नहीं पाती। सफ़ेद झाग आँख में रिसकर पहुँचता है और आँख लाल हो जाती है। हाँ, मेरा चेहरा कुछ घंटों के लिए सफ़ेद ज़रूर हो जाता है। इस शहर में रहने के लिए ज़रूरी है कि रोज़ आप अपने चेहरे पर सफ़ेद झाग लेपें। भले ही आपकी आँख लाल हो जाए लेकिन आपका चेहरा सफ़ेद ज़रूर दिखना चाहिए।

रोज़ दोपहर होते ही मैं एक काँच की इमारत में घुसता हूँ और एक ही तरह की शक्लें देखता हूँ—ये चेहरे मुझे उकता देते हैं। यक़ीनन वे लोग भी मेरी शक्ल को देखकर ऊब जाते होंगे। अगर कोई समाजशास्त्री या मनोवैज्ञानिक मुझे यह बता दे कि इस शहर में ऊब कब, क्यों और कैसे सबके चेहरे पर उतर आती है, तो मैं उसका हमेशा क़र्ज़दार रहूँगा।

मेरे चारों तरफ़ शब्दों का कारोबार हो रहा होता है। सबको अच्छे वाक्य चाहिए होते हैं। सबको अच्छे हुक या इंट्रो चाहिए होते हैं। सबको ऐसे वाक्य चाहिए होते हैं जो भावुक कर दें—जिसमें किसी आदिवासी का ज़िक्र हो, किसी ग़रीब का ज़िक्र हो, किसी घटना का ज़िक्र हो।

शब्द जो कि पहले सोचने से याद आते थे। अब उसे सोचने में अपना समय बर्बाद नहीं करता। उसके लिए लैपटॉप में एक और टैब खुलता है। उसमें सर्च होता है। ChatGPT, Notebook LLM, Claude AI  और भी कुछ-कुछ।

मैं ख़ुद भी कई बार ChatGPT में जाकर शब्दों को सर्च कर चुका हूँ। मुझे कई शब्द ऐसे मिले जो सब जगह मिलते रहते हैं। जैसे : पाप, पुण्य, चोरी, धोखा, ग़ुलामी, चापलूसी, इतिहास; और आख़िर में नीचे यह भी लिखा होता है—‘ChatGPT can make mistakes. Check important info.’ यानी कि चैट जीपीटी ग़लतियाँ कर सकता है। महत्त्वपूर्ण जानकारियों की जाँच कर लें।

मैं AI को कहता हूँ कि मुझे कुछ और शब्द या वाक्य नए तरीक़े से लिखकर दो, वह लिखकर देता। जितनी बार मैं उसे लिखने के लिए कहता हूँ, वह उतनी बार लिखता है। मैं कहता हूँ कि गांधी के बारे में लिखो, वह गांधी के बारे में लिखता है। मैं कहता हूँ गोडसे के बारे में लिखो, वह गोडसे के बारे में भी लिखता है। वह सबके बारे में लिखता है। इंसान और मशीन में यही तो फ़र्क़ है। इंसान कई चीज़ों के बारे में लिखने से बचते रहे या फिर किसी कोने में लिखकर मिटाते रहे, लेकिन AI ऐसा नहीं सोचता।

बहरहाल मैं अपनी ओर लौटता हूँ। मैं जब से इस शहर की ओर आया हूँ तो कितने ही शब्द मेरे ज़ेहन से ग़ायब होने लगे हैं। मैं कई शब्दों को बोलने या लिखने की कोशिश करता हूँ लेकिन उसकी जगह मैं कुछ और लिख देता हूँ। जैसे कई बार मैंने अपनी कविता में बदहाल लिखने की जगह Blinkit और जागरूक लिखने की जगह Zepto लिख दिया।

मैंने पाया कि इस शहर में बोला जाने वाला कोई भी शब्द—ना तो ठोस है, ना पारदर्शी है, ना गाढ़ा है, ना ही द्रव। यह तो एक थूक के जैसा है, जिसे हर कोई अपने मुँह से बस फेंक देना चाहता है और फेंकने के बाद कहना भी चाहता है कि देखा तुमने—मेरा थूक कितना साफ़ है, मेरा थूक कितना सुंदर है, मेरा थूक कितना...

जब शब्दों की बात हो ही रही है तो थोड़ा और कर लेता हूँ। मैं इससे पहले भी कई जगहों पर रहा हूँ। क़रीब दो साल तक मैं बस्तर, कोरापुट और कालाहांडी के नक्सली इलाक़ों में रहा हूँ। वहाँ भी कई शब्द उन दिनों तैरते रहते थे। ये शब्द थे : जल, जंगल, ज़मीन, नियमगिरि, वेदांता, अनिल अग्रवाल, नक्सली, सीआरपीएफ़, मुख्यधारा, बसवराजू, हिड़मा, अमित शाह...

लेकिन इन सबके बीच वहाँ कई सुंदर शब्द भी थे, जो अक्सर छूट जाते थे; जिन्हें मैंने नोट किया था : काजू के पेड़, देवमाली की चोटी, कॉफ़ी की खेती, महेंद्रगिरि, पखाल भात।

जब मैं यह सब शब्दों के माध्यम से ही कह रहा हूँ, तब भी मुझे शब्दों की कमी महसूस हो रही है। मैं इस वक़्त भी अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालकर कुछ ज़रूरी शब्द लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, लेकिन मैं एक असफल शब्द खोजी हूँ। दुनिया के लेखको, तुम अगर मरे नहीं हो तो लिखना छोड़कर शब्द बचाने के लिए निकलो। शब्दों को बड़े शहर खा रहे हैं। जैसे नेता देश को खा रहे हैं। जैसे पूँजीपति जंगल को खा रहे हैं।

मैंने शहर को देखा और मैं मुस्कराया
वहाँ कोई कैसे रह सकता है
यह जानने मैं गया
और वापस न आया।

— मंगलेश डबराल

अफ़सोस कि मैं इन शहरों को देखकर कभी मुस्कुरा नहीं सका। हाँ, यह जानने की कोशिश ख़ूब हुई कि कोई यहाँ कैसे रह सकता है! मैं आ तो गया हूँ लेकिन वापस ज़रूर भाग जाऊँगा क्योंकि मुझे शब्दों से अगाध प्रेम है।

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