Font by Mehr Nastaliq Web

लीला रामनगर की भारी

इन दिनों रामलीलाएँ हो रही हैं। क्योंकि यह लीलाभूमि है, राष्ट्र के दो बड़े नायकों की लीलाभूमि। ब्रज और अवध जिनकी जन्मभूमि रही है। अतः बहुत स्वाभाविक है ‘रामलीला’ और ‘रास’ दोनों की, लोक और शास्त्र दोनों में गहरी संपृक्ति। गहरी संपृक्ति से आशय केवल लोकरंजन के अर्थ में सीमित न रहते हुए उन पर होने वाली शोधपरक, गंभीर, ज्ञानमीमांसाओं, नवीन स्थापनाओं से है। रायबहादुर श्री हीरालाल बी. ए. का ‘अवधी हिंदी प्रांत में राम-रावण-युद्ध’ इसी ढंग की नवीन स्थापना का महान् लेख है। इसमें लेखक ने अकाट्य तर्कों से यह स्थापना दी है कि रामायण की लंका, श्रीलंका नहीं, अपितु अमरकंटक है। रामायण का ‘रामराज’, अयोध्या अर्थात् उत्तर कोशल से अमरकंटक, अर्थात दक्षिण कोशल तक का विस्तृत अवधी हिंदी भू-भाग ही है। राम-रावण का युद्ध यहीं हुआ था। रामायण का ‘सागर’ समुद्र नहीं, बल्कि अमरकंटक के आस-पास तथा महाकोसल (छत्तीसगढ़) के बड़े-बड़े जलाशय हैं। अमरकंटक के सीमांत में फैले ‘दंडकारण्य’ में ‘दंडक’ का अर्थ ही जलप्लावित होता है। यह पढ़ते हुए याद आया कि मैंने भी ‘तालाब’ के लिए ‘सगरा’ शब्द बोला जाना कहीं सुना है। यह महत्त्वपूर्ण शोधालेख 1928 ई. में छपा था।

आज बाज़ारवाद और वैश्वीकरण के दौर में, जब कुछ भी बचा पाना बहुत कठिन हो चला है। सब कुछ एकरंगी हुआ जा रहा है, स्याम-सेत सब एक से हो गए हैं। तब हमें एक बार फिर पुनरवलोकन की, सभ्यता समीक्षा की आवश्यकता महसूस होती है कि कैसे आस्था, अध्यात्म हर बार निरे पाखंड नहीं होते, कई बार उनके होने भर से बचे रह जाते हैं—हमारे सपने, हमारा भविष्य, हमारी प्रकृति। कुंभ के होने भर से बचा है इलाहाबाद। अतिक्रमणों से बच गए हैं दूर तक फैले मैदान और ख़ूब सारी ख़ाली जगहें। जहाँ बच्चे अपना गाँव ढूँढ़ लेते हैं और क्रिकेट खेला करते हैं। इस तरह कुंभ एक तरह से सांस्कृतिक समरूपीकरण के समय में बचाए हुए है बच्चों का बचपन, शहरों में गाँव और व्यक्तियों में समाज। बीएचयू में ‘सीता निवास’ के नेस्तनाबूद होने के बावजूद बचा रहता है, उसके आँगन में तुलसी का चौरा, एक आश्चर्य की तरह।

रामलीलाओं का प्रदेय भी यही है कि बनारस में बचा हुआ है बनारस। पोखरा, रामनगर का गँवईपन, ख़ाली जगहें, दूर तक फैले भू-भाग। बनारस ही नहीं, तमाम छोटे-बड़े, घने आबाद शहरों-क़स्बों में ख़ाली जगहें आश्चर्य की तरह दिख जाती हैं। तो पता चलता है, खसरा में ‘लीलामैदान’ के नाम से दर्ज़ है, इसलिए बचा है। जबकि वहाँ रामलीला भी नहीं बची। रामलीला नहीं बची लेकिन मैदान बच गए। जहाँ जाड़े की गुनगुनी धूप में बच्चे अब भी खेला करते हैं मनचाहा खेल। आस्थाओं का प्रदेय यह भी हुआ करता है।

बनारस लघुभारत है। बनारस की शिराएँ पूरे देश से बद्ध हैं, बनारस की नस छूने पर झनझनाहट, पूरे देश में होती है। इसलिए रामलीला के प्रदेयों का शिरा भी यहीं से छू रहा हूँ। बनारस में रामलीलाएँ हो रही हैं। पुरानी काशी में अर्थात् बनारस के उत्तरी छोर में, मेघा भगत की चित्रकूट रामलीला। मेघा भगत माने गोस्वामी तुलसीदास के सखा। दूसरी रामलीला, काशी के मध्य में, भदैनी की गोस्वामी तुलसीदास रामलीला; यह महंत संकटमोचन के संयोजकत्व में परंपरा से संभव होती रही है। तीसरी, काशी के दक्षिणी छोर में, रामनगर की रामलीला; जो काशीनरेश के संरक्षण में होती आई है। महाराज उदितनारायण सिंह से आरंभ होकर कुँवर अनंतनारायण सिंह तक अनवरत है।

रामनगर की रामलीला की एक बड़ी देन यह है कि इस लीला के निमित्त से गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ का प्रामाणिक पाठ हमारे सम्मुख आ सका।

प्रोफ़ेसर कृष्ण मोहन का वासुदेवशरण अग्रवाल पर हुई गोष्ठी में एक वाक्य था, ‘‘शास्त्र का मानकीकरण लोक से संभव होता है, लोक में बिखरी चीज़ों को जब सूत्रबद्ध किया जाता है, तब वह शास्त्र बन जाता है।’’ रामनगर की रामलीला ने कुछ इसी तरह हमारे साहित्य शास्त्र के लिए पाठशोधन की प्रेरणा दी। और आज ‘मानस’ का प्रामाणिक पाठ, जिसे हम ‘काशिराज संस्करण’ के नाम से जानते हैं, तथा सर्वतोभावेन प्रामाणिक मानते हैं, संभव हो सका।

यह कार्य संभव हुआ था, आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र और काशीनरेश डॉ. विभूतिनारायण सिंह की जुगलबंदी से।

वही आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र, जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शिष्य थे तथा जिनका नागरीप्रचारिणी सभा और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अभिन्न नाता रहा है। इनके बारे में गुरुवर अवधेश प्रधान बताया करते हैं, ‘‘रामचरितमानस की जितनी पांडुलिपियाँ आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने देखी थीं, उतनी किसी ने नहीं।’’

तो हुआ यह कि हस्तारूढ़ काशीराज विभूतिनारायण सिंह परंपरा का अनुसरण करते हुए नित्यप्रति रामलीला दर्शन के लिए जाते थे। उस समय स्वयं उनके पास मानस की जो प्रति रहती थी, वह ‘रामायणपरिचर्या परिशिष्टप्रकाश’ थी। (दरअस्ल इस विशिष्ट टीका का कार्य पाठानुसंधान की दृष्टि से ही महाराज के पूर्वज श्री ईश्वरीप्रसाद नारायण सिंह के द्वारा आरंभ कराया गया था। वह भी पाठानुसंधान की आधुनिक वर्गप्रणाली (ग्राफ़ पद्धति) से, जिसकी उद्भावना उस समय पश्चिम में भी नहीं हुई थी। यह अत्यंत विस्मयकारक था। लेकिन कतिपय कारणों से यह कार्य आरंभ होकर रह गया। बाद में, महाराज प्रभुनारायण सिंह के समय में ‘रामायणपरिचर्यापरिशिष्टप्रकाश’ उसी रूप में प्रकाशित करा दिया गया।) रामलीला में सबसे शुरू में ‘रामचरितमानस’ का प्रसंगानुसार पाठ होता है। पाठ के बाद लीला (अभिनय) होती है और उसी अनुरूप पात्रों के संवाद होते हैं। नेमी जन (पाठकर्ताओं) के सामने मानस की जो प्रति रहती है, व्यासों के पास उसकी जो पारंपरिक हस्तलिखित प्रति होती है तथा काशीराज के सामने जो उक्त प्रति रहती है, इन सबमें पाठों की एकरूपता ना होने से महाराज श्री विभूतिनारायण सिंह के मन में ‘मानस’ की पाठ-एकता का विचार उद्भूत हुआ। और जिज्ञासा हुई कि क्या ऐसा संभव है, कोई ऐसा कर सकता है...। तदनंतर यह जिज्ञासा आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र से की गई, जो उस समय बीएचयू के हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर थे। यह सन् 52-53 की बात थी।

आगे की कथा ऐसी है कि आचार्य ने काशीनरेश से तीन मास का समय माँगा। काशीनरेश का एक निजी पुस्तकालय था, सरस्वतीभंडार। उन तीन महीनों में आचार्य ने ‘सरस्वती भंडार’ में सुरक्षित समस्त दुर्लभ हस्तलेखों, मानस की अनेकानेक दुर्लभप्राय पांडुलिपियों, अनेक प्रकाशन संस्थाओं तथा संपादकों द्वारा प्रकाशित-संपादित, पाठ अनुसंधान के लिए उपयुक्त, विभिन्न संस्करणों का अनुशीलन-अवगाहन किया। इस कार्य में उनके विद्यार्थियों ने तथा काशी राजपरिवार से चंद्रधरप्रसादनारायण सिंह (भानु जी) सहयोग देते रहे।

इसके बाद आचार्य ने काशीनरेश को बताया कि अभी इसमें पाठ शोधन की आवश्यकता है। तथा मानस के पाठ संपादन के लिए हामी भरी। इस दीर्घकालीन परियोजना के लिए अध्यापकीय अवकाश की आवश्यकता हुई, जो तत्कालीन बीएचयू कुलपति श्री नटवरलाल हीरालाल भगवती की सदाशयता से पूरी हुई।

मानस के पाठ अनुसंधान का यह कार्य 1953 में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के संपादकत्व में आरंभ होता है। वह विजयदशमी का दिन था। जब यह लिख रहा था, संयोग से, बनारस में भी विजयादशमी का दिन था। पाठ-संपादन का यह कार्य लगभग दस वर्षों तक चला। यह कार्य काशीनरेश द्वारा स्थापित ‘सर्वभारतीय काशिराज न्यास’ के अंतर्गत होता रहा। जिसके कई उद्देश्यों में एक उद्देश्य, प्राचीन महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का आधुनिक प्रणाली से संपादन और प्रकाशन था। इसी कड़ी में बहुज्ञ विद्वान वाशुदेवशण अग्रवाल ने मत्स्यपुराण का पाठ संपादन का कार्य किया।

काशीनरेश की अध्यक्षता में कार्य करने वाली इसी संस्था के अंतर्गत मानस विभाग गठित होता है और उसमें संपादक की भूमिका आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र निभाते हैं। मानस विभाग के उपस्थापक के रूप में, आचार्य के ही शिष्य रामादास शास्त्री होते हैं। संपादन-सहायक के तौर पर भर्ग्यनाथ दुबे कार्य करते हैं। साहित्यान्वेषक के रूप में श्रीनरेश झा कार्य करते हैं। गंगाप्रसाद वाजपेयी पाठशास्त्री तथा रामनरेश वर्मा पाठसंग्राहक की भूमिका निभाते हैं। इनके अतिरिक्त, बाद में बालसाहित्यकार के रूप में ख्यात श्रीप्रसाद जी, आचार्य के दोनों पुत्र तथा चंद्रशेखर शुक्ल (जिनकी ख्याति आचार्य शुक्ल की प्रामाणिक जीवनी लिखने के लिए है) इस महत्कार्य में सहभागी बनते हैं। 1953 से प्रारंभ इस प्रामाणिक पाठ संपादन का कार्य संवत् 2018 में आचार्य की भूमिका लिखने की तिथि विवाह पंचमी के दिन पूर्ण होता है।

इस तरह रामलीला से जुड़ी पृच्छा से ‘रामचरितमानस’ के प्रामाणिक पाठ शोधन का महनीय कार्य संभव हो सका। इन अर्थों में यह रामनगर की रामलीला का प्रदेय ही है। और लोक द्वारा शास्त्र को परिमार्जित-संशोधित करते रहने की अभिप्रेरणा भी।

वैसे तो रामनगर की रामलीला पर, एक बहाने से कवि व्योमेश शुक्ल की एक लंबी कविता ही है, ‘लीलामय’।

लेकिन कुछ कविताएँ रियाज़ की माँग करती हैं। तभी अपने सिरजे हुए प्रतिसंसार के पट खोलती हैं। ‘लीलामय’ ऐसी ही कविता है। रामनगर की रामलीला पर प्रोफ़ेसर आशीष त्रिपाठी ने पीएच.डी. भी कराई है। लेकिन भावजगत में अर्थों का सही तादात्म्य तभी होता है, जब हम जुगलबंदी करें या कुछ लुका-छिपी खेलें। रामलीला देखकर ‘लीलामय’ के निकट जाएँ या ‘लीलामय’ से रामलीला के मैदान तक। भेद ऐसे ही खुलते हैं। फिर तो यहाँ शताब्दियों के पार जाना होता है। या यूँ कहें कि इस रामलीला में ढाई सौ वर्ष पूर्व के समय का फ़ासला मिटता है।

बिल्कुल वैसा ही मंचन जैसा 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में पहली बार हुआ होगा। नारदवाणी में मानस के प्रसंगानुकूल पाठों का गायन। नेमीजन द्वारा काठ के पीढ़े में बैठकर टॉर्च से देख-देखकर मूल पाठ का मिलान। उजियारे के लिए कपड़े को तेल में भिंगोकर मशालें जलाए रखना। गजारूढ़ काशीनरेश की प्रतिदिन की उपस्थिति, काशीनरेश का सायंकालीन संध्यावंदन, आस-पास के खुले मैदानी भू-भाग। अलग-अलग लीलाएँ अलग-अलग भू-भाग में होना। हाथी पर सवार काशीनरेश का, ‘लीला’ से लौटते हुए राजमार्ग से गुज़रने पर, नगरवासियों द्वारा, दो मिनट के लिए अपना काम-धंधा छोड़कर, दोनों हाथ ऊपर की ओर उठाकर ‘हर हर महादेव’ से वह अभिवादन, यह सब दृश्य जबकि हमारे समय के क्षितिज के लगभग पार जा चुके हैं। इनका फिर से उसी रूप में प्रत्यक्ष होना सचमुच रोमांचकारी होता है।

रामनगर के जनकपुर मुहल्ले में, अश्वारूढ़ भगवान राम, भरतजी, लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी की बारात जनकपुर के लिए निकलना। कुछ समय के लिए जनकपुर मुहल्ले का जनवासा बन जाना। उस जाती और लौटती बारात में रामनगर पीएसी के जवानों का शहनाई बजाना, परंपरा और आधुनिकता का एक तरह से क़दमताल करना है।

जानकीजी का पालकी में अयोध्या आना और ‘परछन’ की प्रतीक्षा का दृश्य तो अद्भुत है, हज़ार आँखें एकटक, इसी तरह ‘भरतमिलाप’ के लख्खीमेले में लाख आँखें एकटक-अपलक। ‘भरतमनावन’ की लीला में पोखरे का कुछ पल के लिए गंगा-यमुना में रूपांतरित हो जाना। ये सब सचमुच विस्मयकारी ही है। लेकिन महीने भर होने वाली इस लीला के लिए धैर्य, रियाज़ के साथ-साथ एक दूसरी ही आँख चाहिए, नहीं तो आप भी मेरे मिरजापुर के दाऊसाहब की तरह कह उठेंगे, ‘‘पंडिज्जी, ई कवन रामलीला बाटै, कुछ समझै में न आवा त, सरवा कुलजने चिल्लात बाटैं, ए होऽऽ, ए होऽऽ।’’

इस तरह बहुत सारे भेद खोलते हुए, बहुत सारे भेद समाए हुए, सदियों की यात्रा करती, रामनगर की यह रामलीला, पूर्वांचल में कहावत बन जाती है :

‘लीला रामनगर की भारी
कजरी मिरजापुर सरनाम’

•

बेला के संसार से और जुड़ने के लिए हमें फ़ॉलो कीजिए : इंस्टाग्राम | फ़ेसबुक

•••

मनीष त्रिपाठी को और पढ़िए : प्रोटेस्ट में पहली बार, तजुर्बे बेशुमार

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट