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केवल इम्तियाज़ हँस रहा है और सब रो रहे हैं

किसे चाहिए 
मन का सोना 
आँख का मोती 
किसे पड़ी है 
अंदर क्या है 
होती रेत है 
लगता पानी 


[वर्ष 2015 में आई इम्तियाज़ अली निर्देशित फ़िल्म ‘तमाशा’ से।]


मैं गए बुधवार इम्तियाज़ अली का इंस्टाग्राम देख रहा था। उन्होंने काफ़ी ऐसे लोगों की स्टोरी शेयर की हुई थीं, जो उनकी नई फ़िल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ देखते हुए रो रहे थे। वे अपने रोने को सेल्फ़ी कैमरे से शूट भी कर रहे थे और सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर रहे थे। चूँकि इम्तियाज़ अली इस तरह की पोस्ट्स अपनी स्टोरी पर शेयर कर रहे थे, तो लोग बढ़-चढ़कर इस तरह का कंटेंट बना रहे थे। फिर वही लोग इम्तियाज़ के पोस्ट या कमेंट का स्क्रीनशॉट लेकर उसे फ़्लॉन्ट भी कर रहे थे। सोशल मीडिया और PR की ज़बान में इसे मुफ़्त की पब्लिसिटी कहते हैं—सबके लिए विन-विन सिचुएशन। सेलेब्रिटी लोग तो अलग से PR एजेंट रखते हैं, इस काम के लिए।

ख़ैर, अब मेरी बात। मैं इतने सालों से फ़ेसबुक पर हूँ; इतने विवाद देखे हैं, लेकिन हमेशा यही कोशिश रही है कि मुझे किसी विवाद से न पहचाना जाए। कभी किसी व्यक्ति को टारगेट करके नहीं लिखा, हमेशा प्रवृत्ति पर बात की। मैंने इसी प्रवृत्ति पर गत बुधवार को फ़ेसबुक पर लिखा :


ठीक है, बहुत भावुक फ़िल्म है, मान लिया। इम्तियाज़ की है, अच्छी ही होगी।

मेरे कुछ दोस्तों ने बताया, वे फ़िल्म ख़त्म होने के बाद सिनेमा-हॉल में बैठे रह गए। एक दोस्त ने कहा, दो-तीन  दिन दिमाग़ से नहीं उतरेगी। लेकिन, लेकिन, लेकिन—वे कौन लोग हैं जो ऐसे में कैमरा निकालकर ख़ुद को रोते हुए न सिर्फ़ शूट कर ले रहे हैं, बल्कि सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर दे रहे हैं? ‘सय्यारा’ देखकर दहाड़े मार-मारकर हॉल में रोने वालों से ज़्यादा गए-गुज़रे ये लोग हैं, जिनके यहाँ हर चीज़ को लाइक-शेयर-कमेंट-मोमेंट बनाने की जल्दबाज़ी है। ख़ैर… सबकी अपनी-अपनी समझदारी और मर्ज़ी। मेरे लिए ऐसे क्षण इतने व्यक्तिगत होते हैं कि बाद में इनकी चर्चा तक करना इन्हें छोटा बना देने जैसा लगता है। मोबाइल निकालकर रिकॉर्ड करने का बचकाना ख़याल आ जाए, तो ख़ुद पे शर्म और तरस ही आएगा उस वक़्त।


कुछ लोगों के कमेंट से पता चला कि काफ़ी लोग इस फ़ेसबुक-पोस्ट को एक हिंदी लेखिका पर आरोपित समझ रहे हैं, क्योंकि उन्होंने भी सिनेमा-हॉल में इस फ़िल्म को देखते हुए एक भावुक रील पोस्ट की थी। मैंने उन लेखिका की वॉल देखी तो समझ आया कि हाँ, किसी को मेरी पोस्ट टारगेटेड लग सकती है; क्योंकि फ़ेसबुक-बिरादरी ने शायद इम्तियाज़ अली का इंस्टाग्राम नहीं देखा होगा। लेकिन लेखिका ने चूँकि इम्तियाज़ को टैग किया था; तो उन्हें पता ही होगा कि यह पोस्ट उनके बारे में नहीं है, बल्कि उस नए ट्रेंड के बारे में है जो ‘सय्यारा’ के बाद से चर्चा में है। 

बहरहाल, इसके बाद मेरी पोस्ट पर लेखिका के कमेंट से मैं आश्वस्त हो गया कि उन्होंने इसे व्यक्तिगत हमले की तरह नहीं लिया। मेरी पोस्ट पर कुछ लोगों ने लेखिका के बारे में ख़राब बातें भी कहीं, जिन्हें मैंने इंटरटेन नहीं किया। मैं जानता हूँ कि इस देश में किसी महिला के ख़िलाफ़ लिखना आपको रात के बारह बजे भी ठीक-ठाक लाइक दिलवा सकता है। लेखिका के कमेंट का मैंने जवाब दे दिया। मुझे लगा, बात ख़त्म।

लेकिन कल शाम लेखिका ने कुछ इस आशय की पोस्ट लिखी कि उनके वीडियो पर चर्चा हो रही है और लोग ये कह रहे हैं, वो कह रहे हैं... शायद उनका इशारा मेरी पोस्ट पर आए कुछ लोगों के कमेंट की तरफ़ था, क्योंकि मैंने तो ऐसा कुछ नहीं कहा था, न ही इसमें चर्चा जैसा कुछ था। यह लिखाई मेरी सामान्य फ़ेसबुक-लिखाइयों सरीखी ही थी। 

ख़ैर, अँग्रेज़ी-हिंदी के उद्धरणों से सजा “बेबी डॉल मैं सोने दी, ये दुनिया पीतल दी...” टाइप कंटेंट सोशल मीडिया पर हमेशा हिट रहा है। इस पर विवादजीवी, गो-गर्ल-पगलू, ‘तुमसे बड़ी है मेरी पीड़ा’ के लठैत, ‘हमें भी चीन्हा जाए’ क़िस्म के अधपगले और अपनी कविताओं के लिंक लेकर इनबॉक्स-इनबॉक्स भटकने वाले ऑनलाइन भिखारियों (ऑ.भि.) के कमेंट आए; जिसकी उम्मीद थी ही और रहती ही है। लेकिन जिसकी उम्मीद नहीं थी, वह था लेखिका का हर मूर्खतापूर्ण बात को इंटरटेन करना।

एक ऑ.भि. ने तो यहाँ तक लिख दिया : “बेवक़ूफ़ लोग हैं, जो इस बात पर ट्रोल करने की कोशिश कर रहे होंगे। मैंने देखा नहीं है कि उन्होंने क्या कहा है; लेकिन जो भी कहा होगा, बेवक़ूफ़ी ही है।”

मतलब, देख रहे हैं आप! इस चोट्टे को समर्थन देने की इतनी उत्तेजना है कि इसे यह जानने की भी ज़ुरूरत-जुरअत नहीं लगी कि बात क्या है! क्या साहित्यकार बनेगा रे तू!

ख़ैर, लेखिका जवाब में भी इस ऑभि को यह बताना नहीं भूलीं कि इम्तियाज़ अली ने इस पर सुंदर टिप्पणी की है; जबकि लेखिका अपनी पोस्ट में इम्तियाज़ की टिप्पणी का स्क्रीनशॉट पहले ही लगा चुकी थीं।

एक बार फिर कह दूँ, मैं इस हरकत को ‘सय्यारा’ की तथाकथित टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी के ही एक्सटेंशन के रूप में देख रहा हूँ और यह हद दर्जे का परफ़ॉर्मेटिव-एक्ट है—रोने को शूट करने से लेकर सेलेब्रिटी को टैग करने, रिएक्शन के कमेंट का स्क्रीनशॉट लेने और उसे जहाँ-तहाँ चस्पाँ करने तक। यह एक आत्मघाती मूर्खता का दुश्चक्र है जिसमें कई गंभीर स्रष्टा(ओं) के साथ-साथ कुछ लघु मानव, कुछ महामानव और दो चे ग्वेरा फँसे हुए हैं। 

दुनिया भर के कवि, दार्शनिक और मनोविज्ञानी रोने को एक नितांत निजी अनुभव कहते रहे हैं—शुद्धि से लेकर थेरेपी तक—लेकिन वे शायद हम प्रतिभावानों से परिचित नहीं हैं, जो हर चीज़ को बेचने-योग्य बनाने में माहिर हो चुके हैं। लाइक-कमेंट हमारी आत्मा तक को करप्ट कर चुके हैं। हम कैसे वैलिडेशन के भूखे, गरिमाहीन मनुष्य बनने की तरफ़ बढ़ रहे हैं! क्या हमने ‘तमाशा’ की तारा से कुछ नहीं सीखा? क्या हम भी वेद की तरह रोबोट बन गए हैं, जिसके पास कुछ नहीं है—सिवाय प्रस्तुति के—न अपना कोई मन, न एकांत... या शायद हम उससे भी गए-बीते हैं, क्योंकि उसका रोना तो कम से कम असली था। वह अपने रोने की पैकेजिंग तो नहीं कर रहा था। रोना कोई क्रिया नहीं है, न मूल्य है। रोना एक अनुभव है—कई बार जीवन बदल देने वाला अनुभव। यह दुनिया के श्रेष्ठतम साहित्य के मूल में है, जिसकी परंपरा वाल्मीकि से लेकर नीत्शे तक व्याप्त रही है। 

ख़ैर, उन कमेंट्स का शुक्रिया, जिनकी वजह से मुझे इसका पता चला, वरना मैं इसे ‘सय्यारा’ टाइप लाउड जेन-ज़ी हरकत ही समझता रहता। 

यहाँ एक शिकायत इम्तियाज़ से भी है : अगर उन्होंने लेखिका की रील अपनी स्टोरी में साझा कर दी होती, तो मैं पहले ही सावधान हो जाता, पोस्ट भी सँभलकर लिखता और लेखिका के पास एक और स्क्रीनशॉट होता।

पुनश्च/ध्यानार्थ : यह फ़िल्म-समीक्षा नहीं, दर्शक-समीक्षा है। इस समीक्षा पर अगर कोई प्रतिवाद हमें प्राप्त होता है, तो उसे प्रकाशित करके हमें प्रसन्नता होगी। इसे यों भी कह सकते हैं कि इस विषय पर यहाँ प्रतिवाद आमंत्रित हैं।   

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