कविता के शब्द सत्य का पीछा करते रहते हैं
गोबिंद प्रसाद
28 नवम्बर 2025
[एक]
कवि हृदय का वकील होता है। उसकी वकालत तर्क की झूठी बैसाखियों के सहारे नहीं वरन् सच्चे मनुष्यत्व की नैतिकता और निष्ठा की अदृश्य बहनेवाली अंत:सलिला पर चलती है जिसके होंठों पर सदा इंसानपरस्ती का राग फूटता रहता है।
कवि का तो झूठ भी काम आता है—कल्पना बनकर। इसलिए कवि का झूठ-झूठ थोड़े ही होता है। वह तो उस झूठ के सहारे एक नया चित्र एक नया बिंब और एक नई दुनिया का संभवन हमारे सम्मुख ला खड़ा करता है। इस तरह वह एक नई दुनिया का ख़ाका पेश करता है जिसमें किसी लाचार-मज़लूम की आँख से गिरा हुआ आँसू सहसा फूल बन जाने की हिकमत रखता है... जिसमें किसी अदृश्य होंठ से निकला हुआ मंत्र समाज की समस्त कलुषता को बहा ले जाए और किसी फ़क़ीर की सदा बन जाए... लहरों से बहुत मुमकिन है लय फूटने लगे और समुद्र के सीने से एक विराट आह जो धरती की सिहरन बनकर ममता का राग बन जड़-चेतन में स्पंदन भर दे... कहीं से शब्द का अंतर्निहित प्रकाश इस तरह अवतरित हो कि घर-भर में उजाला हो जाए—आत्मा के इस उजाले और उससे फैली धरती पर उज्ज्वलता का दूसरा नाम ही तो कवि है।
बड़ा कवि वह होता है जिसमें आने वाले समय कई कवि समाए रहते हैं। उसकी कविता में कई कवि बोलते हैं—अपनी बोली। अपना समय तो बोलता ही है, बल्कि उसकी कविताओं में आने वाला ज़माना आने वाला वक़्त भी जेठ की दुपहरी में भाय-भाय सन्नाटे-सा बोलता है। बड़े कवि की कविताएँ अपने समय को सोख लेती हैं। अधूरेपन की मुकम्मल तस्वीर भी ये कविताएँ एक संपूर्णता के साथ दिखाती हैं।
[दो]
और कविता, कविता मृत्यु के गलियारे तक ले जाने की कला है। कविता जीवन को सोखती हुई मौत के उजाले तक पहुँचती है। शब्दों का उजाला होने का उजाला है। यह होना अपने जन्म से ही अनिवार्यतः नास्ति भाव से बद्धमूल है। क्षरण उसके प्रारब्ध से लिपटा हुआ है। मृत्यु के द्वार तक कैसे पहुँचना है यही तो कला सिखाती है—पतझर में झरते हुए पत्ते का सौंदर्य देखिए, किसी वसंत से कम है! सुख का सातत्य आंनद को जन्म नहीं दे सकता। आंनद की अनुभूति तो सर्जना के समुद्र में पड़ने वाले भँवर में होती है।
कविता वह कुछ है जो मुझे मेरा अधूरापन बताती है। जैसे-जैसे वह पूरी होती जाती है, अब तक अनदीखा रहा आया मेरे सम्मुख आ खड़ा होता है। मेरा अधूरा पूरा होता जाता है। जितना यह अधूरा पूरा होता जाता है, साथ ही उस होते हुए पूरे में से फिर एक अधूरा जन्म लेता जाता है। यह रूप पर रूप धारण करने की प्रक्रिया मुझे संपन्नतर बनाती जाती है—‘एक मैं कितना अधूरा हूँ’ (रघुवीर सहाय) मुझे यह मेरी कविता बताती है।
[तीन]
जीवन के सामने उपन्यास क्या है—ज़्यादा से ज़्यादा एक वाक्य ही तो है! ...बस और क्या!
...और कविता : उम्र की एक बूँद जिसमें कभी-कभी जनम-जनम के आ मिले अनुभव का आलोक आलोक शब्द में अवतरित हो जाता है और जिसमें वेदना से उपजे मानुष-प्रेम की अखंड अहर्निश ज्योति जला करती है और इस ज्योति के लिए वेदना और प्रेम में एक शब्द ही काफ़ी है :
‘एकै आखर प्रेम का!’
[चार]
...कविता! हर बार एक नई आस जगाती है। कविता मेरी बेतरतीबी की ‘कलाई पकड़’ है। वह मुझे हर बार तरतीब देने की कोशिश है। वह मेरे बेगानेपन से हाथ मिलवाती है। मुझमें ही जो मेरा (या मुझसे) अजाना दरिया है, उसमें कविता ‘परिचय की गाँठ’ लगाती है। लहरें बनकर ‘देर से इंतिज़ार है अपना’ वाला आलम जब रहता है, तब तक मैं कविता के सहरा में लापता रहता हूँ। इसीलिए जब तक अपना पता नहीं है, तब तक काल की क्रूरता से बाहर हूँ। उसकी ज़द से उसकी हदूद से बाहर हूँ। लेकिन न सिर्फ़ बाहर हूँ, बल्कि अपने इस लापता काल के सर्जना समय की दहलीज़ से ही भौतिक काल की दुर्दमनीयता को ललकार भी पाता हूँ—
एक दुनिया मैं अपने अंदर हूँ
इस क़फ़स की फ़ज़ा से बाहर हूँ
सर से पा तक लहू टपकता है
आप अपनी अना का मंज़र हूँ
हासिले-सद-सफ़र है बेताबी
पहले दरिया था अब समंदर हूँ
— हसन नईम
[पाँच]
दरअस्ल, कविता रूह का लिबास है। अदृश्य सत्ता का पराग जगाती वह हमारे भीतर शब्दों का उजाला लेकर उतरती है। शब्दों का न दिखाई देने वाला पराग उस रहस्य भरे इलाक़े में ले जाता है, जहाँ ज़िंदगी का आख़िरी सच हमारा इंतिज़ार करता है—नीले हिसारों वाला देश। इसीलिए शब्द, मृत्यु की छाया को बींधने वाला मंत्र।
शब्द : कालजित् सृष्टि। मौत को सँवारनेवाला।
[छह]
कभी-कभी ‘अच्छी कविता’ और ‘नहीं अच्छी’ या ‘कम अच्छी कविता’ में इतना ही फ़र्क़ होता है कि अच्छी कविता बहुत छोटे में ही अर्थ का बहुत बड़ा प्रकाश भर देती है, उसमें सार-सूत्र इस तरह व्यंजित और प्रकाशित होकर खिल उठते हैं कि जैसे सृष्टि का कोई अनचीन्हा रहस्य छू लिया हो जबकि ‘नहीं अच्छी’ या कम अच्छी कविता देखने में बहुत बड़ी होने पर भी शब्दों की दृष्टि से बहुत ख़र्चीली होने पर भी कही हुई किसी बात को महज़ शब्दों के ख़र्चीले भड़काऊ लिबास के खोल में कौतुक भर होकर रह जाती है। अच्छी कविता बहुत बार सार-सूत्र में जीवन का स्पंदन भर देती है। जैसे सृष्टि के आईने से रहस्य की धूल एकाएक झरकर जीवन का चेहरा दमक उठा हो, किसी महातेजो पुंज की तरह।
इस तरह कविता महज़ कल्पना की अठखेली भर नहीं है, न ही शब्द-विलास। वह तो उल्लास का पराग है और वेदना का प्रकाश-पुष्प।
कविता के शब्द सत्य का पीछा करते रहते हैं। हम जीवन भर शब्दों की टॉर्च से सत्य को तलाशते रहते हैं। सत्य मृत्यु है। नहीं... अगर मैं इसे उलटकर कहूँ—मृत्यु सत्य है तो, कोई फ़र्क़ पड़ेगा!
[सात]
कविता प्रकृति के समक्ष प्रार्थना रूप है जो हृदय के आकाश में शब्दातीत भास्वर होती रहती है।
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