इरफ़ान ख़ान : एक अभिनेता नहीं, एक संभावना
अजय कुमार यादव
29 अप्रैल 2026
हिंदी सिनेमा में अभिनय की जो परंपरा नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर और रघुवीर यादव जैसे कलाकारों के माध्यम से तथाकथित मुख्यधारा में विकसित होती है, उसे इरफ़ान ख़ान ने नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। इरफ़ान का अभिनय मुख्यधारा और समानांतर हिंदी सिनेमा के बीच की दूरी को कम करता है। उनकी विशेषता यह है कि वह अभिनय को ‘प्रदर्शन’ (Performance) से ‘अनुभव’ (Experience) में बदल देते हैं। भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं जो अपने समय के सिनेमा का सिर्फ़ हिस्सा नहीं हैं, वे अपने समय को परिभाषित भी करते हैं। इरफ़ान ख़ान ऐसा ही एक नाम है। उनको पर्दे पर देखना अपनी पहली मुहब्बत से लंबे अंतराल के बाद मिलने जैसा है। उन्हें अभिनय करता देख एक अजीब-सी कसक और अपनापन एक साथ महसूस होता है। वह एक ख़ुशनुमा शाइरी की तरह थे।
इरफ़ान ने यह साबित किया कि अभिनय केवल तकनीक नहीं, बल्कि आत्मा का विस्तार है। उन्होंने अपने अभिनय में जो अनगढ़ता और यथार्थ भरा, उसने आगे आने वाले कलाकारों के लिए रास्ता बनाया। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, मनोज बाजपेयी, विजय वर्मा, पंकज झा, आयुष्मान खुराना, राजकुमार राव, जयदीप अहलावत, जितेंद्र कुमार, फ़ैसल मलिक, दुर्गेश कुमार, अभिषेक बनर्जी और अशोक पाठक जैसे कलाकार उसी परंपरा के विस्तार हैं। हम उनको पसंद करते-करते इन सबको पसंद करने लगे। उन्होंने सिनेमा देखने के लिए दर्शकों की दृष्टि बदल दी, यह उनके द्वारा हिंदी सिनेमा को दिया गया एक ज़रूरी तोहफ़ा है।
मैंने इरफ़ान अभिनीत सबसे पहली फ़िल्म ‘हासिल’ देखी थी। अभिनय सीखने वालों के लिए ‘हासिल’ एक टेक्स्ट है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र-संघ चुनाव की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म में, रणविजय सिंह का किरदार—एक जटिल,आक्रामक लेकिन भीतर से संवेदनशील व्यक्ति है। फ़िल्म में इरफ़ान की आँखे ख़ुद भी एक किरदार की तरह नज़र आती हैं। उनसे अधिक उनकी आँखें बोलती हैं। इरफ़ान की आँखे अभिनय की पाठशाला है। वह संवादों से अधिक आँखों से अभिनय करते थे। उनकी आँखों में जो ठहराव है, वह केवल अभिनय का कौशल नहीं, बल्कि जीवन के गहरे अनुभवों का परिणाम था। वह ‘आँखों से अफ़साना लिखते थे’। उनकी तुलना हिंदी साहित्य की उस कविता-परंपरा से भी की जा सकती है, जहाँ संकेत और मौन, शब्दों से अधिक प्रभावशाली होते हैं, जैसे बिहारी की नायिका ‘भरे भवन में’ आँखों से संवाद करती है। उनका किरदार भारतीय सिनेमा में ‘एंटी-हीरो’ की नई परिभाषा गढ़ता है। यह वह क्षण है, जहाँ से मेरी पीढ़ी के लोग खलनायक के किरदार को पसंद करने लगते हैं। उस किरदार को उन्होंने जिस गहराई से निभाया, उसने ‘खलनायक’ की धारणा को बदल दिया। बाद के वर्षों में कई अभिनेता उस शैली की नक़ल करते दिखाई देते हैं, लेकिन वह गहराई, सहजता दुर्लभ ही रही। फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने इरफ़ान के अभिनय की उस ‘सहज जटिलता’ की ओर ध्यान दिलाया है, जो उन्हें मुख्यधारा के अभिनेताओं से अलग करती है। उनके अनुसार, इरफ़ान का अभिनय दर्शक को ‘इंप्रेस’ नहीं करता—वह उसे ‘इंगेज’ करता है। यह फ़र्क़ ही उन्हें विशिष्ट बनाता है।
इरफ़ान की तुलना किसी हॉलीवुड अभिनेता से की जाए तो वह एंथनी हॉपकिंस होंगे। दोनों कलाकारों में एक अद्भुत समानता है—मौन की शक्ति। इरफ़ान अपने किरदारों में एक आंतरिक शांति और गहराई लेकर आते हैं, चाहे वह ‘मक़बूल’ हो या ‘द लंचबॉक्स’। ‘मक़बूल’ में इरफ़ान के किरदार का अपराधबोध और आंतरिक द्वंद्व दोनों दिखता है। उनकी फ़िल्में यह दिखाती हैं कि ‘डर’ और ‘अपराध’ को चिल्लाकर नहीं, बल्कि शांत होकर भी व्यक्त किया जा सकता है। इरफ़ान अपने किरदारों में मानवीय विखंडन (Human fragmentation) को प्रस्तुत करते हैं। यह सिद्ध करते हैं कि अभिनय का सबसे बड़ा उपकरण संवाद नहीं, बल्कि उपस्थिति (presence) है।
इरफ़ान दर्शकों को प्रभावित नहीं करते, वह अपनी उपस्थिति मात्र से अंदर तक विचलित करते हैं। ‘लंचबॉक्स’ में साजन फ़र्नांडिस का जो आतंरिक द्वंद्व है, वह निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ के पात्र डॉ. मुकर्जी का आतंरिक द्वंद्व है, जिसमें पत्नी के मरने के बाद की पीड़ा भरी अंतहीन प्रतीक्षा है और नए जीवन की शुरुआत को लेकर सेल्फ़ डॉउट भी है। उनके द्वारा निभाया गया साजन फ़र्नांडिस सिनेमा के सबसे सूक्ष्म और मानवीय पात्रों में से एक है। यह चरित्र बाहरी रूप से बेहद साधारण, शांत और एकाकी दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर भावनाओं, स्मृतियों और अधूरेपन की एक गहरी दुनिया छिपी हुई है। ‘पिकू’ फ़िल्म में इरफ़ान की उपस्थिति सघन कोलाहल में एक गहरी शांति है। वह जीवन को व्यवहारिकता में देखता है। राणा चौधरी का किरदार यह बतलाता है कि रिश्तों में समझ, सहजता और सम्मान स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।
इरफ़ान ने मृत्यु से पहले अंतिम पत्र लिखा, जिसमें उनके भीतर का संवेदनशील मनुष्य अपनी पूरी जिजीविषा के साथ उपस्थित है जो मृत्यु को भी एक अनुभव की तरह देखता है। उस पत्र में वह लिखते हैं—“केवल अनिश्चितता ही निश्चित है”। यह अनिश्चितता-बोध उनके किरदारों में भी है इसलिए अपनी माँ के निधन के कुछ ही दिनों बाद उनका भी चले जाना—यह केवल एक जैविक घटना नहीं, बल्कि एक गहरी भावनात्मक यात्रा का अंत लगता है। उनकी यात्रा केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है; यह उस पूरे सामाजिक वर्ग की आकांक्षा का विस्तार है जो छोटे शहरों से निकलकर बड़े सपने देखता है। हम जैसे दर्शकों के लिए वह केवल अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक ‘संभावना’ थे कि साधारण पृष्ठभूमि से भी असाधारण ऊँचाइयाँ हासिल की जा सकती हैं। उनके जाने के साथ जो ख़ालीपन आया है, वह केवल सिनेमा का नहीं बल्कि संवेदनाओं के पूरे परिदृश्य का ख़ालीपन है।
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