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हिन्दवी उत्सव : कविता, आलोचना और संगीत के बीच एक दिन

मेरी इच्छा थी कि मैं ‘हिन्दवी उत्सव’ की रपट को किसी कविता से शुरू करूँ, लेकिन डर था कि कहीं रपट छोड़कर उस कविता को निशाने पर ना ले लिया जाए, इसीलिए थोड़ा लरजते और पाठकों की संख्या का अनुमान लगाते हुए मैं इसे वैसे ही शुरू करने की कोशिश करता हूँ, जैसा आयोजन की संचालक सबाहत आफ़रीन ने उत्सव को शुरू करते हुए किया था। 23 अगस्त को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज (NCZCC) में आयोजित यह कार्यक्रम इलाहाबाद की बारिश और ख़ुद इलाहाबाद की अलसाई प्रवृत्ति—जिसके बारे में कहा जाता है कि ख़ुद हनुमान जी महाराज यहाँ आकर लेट गए हैं—के कारण आधे घंटे की देरी से शुरू हुआ, क़रीब 12 बजे। दर्शकों की उपस्थिति धीरे-धीरे बढ़ रही थी और वालंटियर लगातार सक्रिय नज़र आ रहे थे। ध्यान देने पर कभी-कभी यह पता चलता कि वे कभी-कभी आपस में ही खींचातानी में थे कि इसे ऐसे नहीं, ऐसे। आयोजन स्थल पर अपने को व्यस्त दिखाना भी एक कला है, जिससे आप दर्शक की भूमिका में बैठे अपने दोस्तों से नज़र बचा सके।

सबाहत ने कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत करने के लिए स्थानीय आयोजक प्रवीण शेखर को बुलाया। प्रवीण इलाहाबाद शहर के मक़बूल रंगकर्मी हैं और ‘बैकस्टेज’ नाट्य संस्था के संयोजक हैं। प्रवीण ने अपनी बात को उतना ही रखा जितनी आवश्यक थीं। उन्होंने साफ़गोई से बताया कि वह हिंदी कविता की दुनिया से कैसे जुड़े। ‘हिन्दवी’ की टीम को इलाहाबाद की ओर से धन्यवाद पेश करते हुए उन्होंने चलताऊ लहजे में साथी आयोजक अमितेश का धन्यवाद किया, जिसे शायद वह ख़ुद भी मन से ज़रूरी नहीं मान रहे थे। यह सब लिखने में लगे समय से कम समय में उन्होंने अपनी बात पूरी की और मंच को सुपुर्द-ए-सबाहत किया।

सबाहत ने प्रियंवद का परिचय देते हुए कार्यक्रम को गति दी, लेकिन यह लिखते हुए मैं रुक गया। भला अब अगर प्रियंवद को भी पहचान की ज़रूरत क्यों? ख़ैर, संचालक की परिचायक शैली पिष्टपेषण के उस शिल्प में थी, जिसमें प्रियंवद का नाम हटाकर किसी भी साहित्यकार का नाम रख देने में कोई परेशानी ना होती! जैसे— प्रियंवद जी विनोद कुमार शुक्ल जी ने साहित्य को संवेदना से प्राप्त किया है आदि-आदि...

अपने परिचय के बाद ‘पीकी ब्लाइंडर्स’ के थॉमस शेल्बी की ड्रेसिंग स्टाइल को याद दिलाते प्रियंवद ने मुख्य रूप से लेखकीय मन के दो सवालों पर बात की। पहला, जो आत्मनिष्ठ होते हुए भी वस्तुनिष्ठ था—मैं लेखन की दुनिया में क्यों आया? और दूसरा, हमें क्यों लिखना चाहिए? पहले सवाल के लिए उन्होंने कहा, pleasure of writing और anarchical liberty उनके लिए काव्य-प्रयोजन है। दूसरा सवाल उनकी पूरी बात के केंद्र में था। उन्होंने कहा, साहित्य ही एकमात्र ऐसा अनुशासन है जो मनुष्य की पक्षधरता की बात करता है। (हालाँकि अगले सत्र में इस बात से असहमति स्मृति सुमन ने जताई और कहा कि साहित्य इस मामले में एकमात्र नहीं है, सिनेमा भी वही सत्ता-प्रतिरोध का काम करता है, भले ही इसकी आयु-सीमा कम है।)

साहित्य का सीधा टकराव सत्ता से दिखते हुए उन्होंने सत्ता के 4 प्रकार बताए—राज्य, धर्म, समाज और पूँजी। प्रियंवद अपने समकालीन और युवा साथियों से कहते हैं, लिखने के क्रम में आत्मावलोकन कीजिए कि आपने कितना grow किया। कुल मिलाकर उनकी बात को सूत्रवत संक्षिप्त करें तो—why literature and how much grown पर वह केंद्रित रहे।

इसके ठीक बाद ‘गो-दान’ और ‘उसने कहा था और दूसरी लिखाइयाँ’ का लोकार्पण हुआ, जिसके लिए मंच पर तिग्मांशु धूलिया और प्रियंवद थे।

सबाहत ने इलाहाबादी दर्शकों को इंगेज करने के पुराने और घिस चुके ढर्रे को अपनाते हुए गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के मार्फ़त कुछेक मामूली शेर पढ़े, फिर तिग्मांशु का परिचय देने में अपने किसी राजस्थानी दोस्त का असंबद्ध ज़िक्र किया। जब से आंशी ने संचालन का ज़िम्मा सँभाला, बात कुछ आगे बढ़ती दिखाई दी।

शायद ‘हम तुमको याद रखेंगे गुरु’—‘हासिल’ का यह डायलॉग रणविजय ने अनिरुद्ध के लिए नहीं, तिग्मांशु ने इलाहाबाद के लिए कहा था।

संजीदा और सुसंगत शहरों की सूची बनाते वक़्त तिग्मांशु इलाहाबाद को सबसे ऊपर रखते हैं, फिर कलकत्ता को, लेकिन आंशी से बात करते हुए उन्होंने कहा, दुख है कि इलाहाबाद अपना किरदार खो रहा है। अब न तो शहर की कोई स्थानीयता रह गई, न ही वहाँ बसने वाले लोगों की।

चूँकि बात ‘हासिल’ से शुरू हुई थी तो छात्र राजनीति की चर्चा लाज़मी थी। तिग्मांशु यहाँ भी निराश होते स्वर में कहते हैं, अब के छात्र नेता—नेता कम, ठेकेदार ज़्यादा हैं। इरफ़ान के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि वह वैश्विक अभिनेता थे, जिसका मुख्य कारण उनका थिएटर कलाकार होना है। चाहे ‘हासिल’ में इरफ़ान की जगह का सवाल हो, चाहे ‘साहब बीबी गैंगस्टर’ फ़िल्म के सेट का क़िस्सा—हर जगह वह अपने पुराने यार के याराने को याद करते दिखे।

अब बारी थी रैपिड फ़ायर की। जो लोग इससे परिचित हैं उनका ठीक है, जो नहीं हैं उनके लिए बता देते हैं कि यह सवाल-जवाब का एक तरीक़ा है, जिसमें प्रश्नकर्ता किसी शख़्सियत का नाम लेता है और जवाब देने वाले को एक शब्द में उस शख़्स के बारे में कुछ कहना होता है।

तिग्मांशु इस विधा के पुराने खिलाड़ी लगते हैं। उन्होंने किसी भी सवाल का सनसनीखेज़ जवाब नहीं दिया और लगभग लोगों को इलाहाबादी परंपरा में छोटा भाई बना दिया, जिसमें टाइट रहो का स्वर नेपथ्य से सुना जा सकता था।

साहित्य के सिनेमाई रूपांतरण को लेकर वो एकदम निराश लगे। हॉलीवुड की बहुचर्चित फ़िल्मों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि VFX तकनीक के पहले, जब कहानी ही फ़िल्मों का केंद्र होती थी, तब हॉलीवुड में वही फ़िल्में पसंद की जाती थीं जो किसी-न-किसी साहित्यिक रचना पर आधारित होती थीं, जैसे ‘Shawshank Redemption’ और ‘Frankenstein’। लेकिन हिंदुस्तान में यह तरीक़ा ख़ास प्रचलन में नहीं रहा। अपनी योजना के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले समय में वह पंकज त्रिपाठी के साथ उदय प्रकाश की कहानी ‘दिल्ली की दीवार’ पर फ़िल्म बनाने का सोच रहे हैं।

और इसी के साथ उत्सव का पहला सत्र समाप्त हुआ। वक्ताद्वय और संचालक आदि नेपथ्य या दर्शकदीर्घा में आ गए। स्वयंसेवकों (राष्ट्रीय नहीं, स्थानीय) ने मंच सँभाला और अगले सत्र के लिए उसे तैयार करने लगे।

यह उत्सव अपने मुख्य आकर्षण की ओर बढ़ चला था। अगला सत्र 10 चयनित कवियों के काव्यपाठ का था, जिसकी चर्चा के लिए मैं सूचना के क्रम में उन दसों कवियों के नाम नहीं लिखूँगा। वे स्मृति के सहारे बात में आते जाएँगे, ऐसी मुझे आशा है।

इस सत्र की सूत्रधार आंशी थीं, जो अपनी देह-भाषा से आत्मविश्वासी नज़र आईं। दर्शक दीर्घा में कुछ ऐसे चेहरे नज़र आ रहे थे, जो केवल इसी सत्र के लिए या कहिए कि मत-परिणाम जारी होने तक के लिए आए थे। कविता किस खेत की मूली है, इससे उन्हें कोई ख़ास मतलब नहीं था। इनमें से कुछ वो थे जो अभी भी हॉस्टलों पर क़ब्ज़ा जमाए हुए हैं और 2018 से बंद पड़े छात्रसंघ चुनाव की यादों में लहालोट हो जाते हैं। वे वर्षों बाद इलाहाबाद में किसी जगह वोट देकर उसका परिणाम जानने की कुलबुलाहट में उचके जा रहे थे।

कविता में लोकतंत्र आए, यह बहुत ज़रूरी है, लेकिन कवि लोकतंत्र की प्रक्रिया से आए, इसमें बहुत तरह का ख़तरा है। आज से 40 वर्ष पहले यदि वोटिंग प्रक्रिया से कवि चुना जाता तो नामवर सिंह पहले स्थान पर होते। आज के समय में भी यदि लोकप्रियता को ही मानक मानना है तो कुमार जी वास्तविक युग-कवि हुए। ऐसी कुछ बातें मेरे मन में चल रही थीं कि कविता-पाठ आरंभ हुआ।

प्रतिभागी कवियों में पहले वाचक अमन त्रिपाठी थे, जो सभी चयनित कवियों में अकेले थे जिन्होंने बाल कविता पढ़ी। ‘प्रिज्म’ उनकी दूसरी कविता थी। आसित आदित्य क्रम से दूसरे थे, जिनकी कविता ‘जीना’ की एक पंक्ति मुझे अच्छी लगी—सबसे निर्ममता से मारती है नादानी। कंचन सिंह ने ‘स्त्री और घास’ शीर्षक की कविता का पाठ किया। इसके अलावा समकालीन राजनीतिक बिंबों पर आधारित उनकी कविताओं ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद कुशाग्र ने कविताओं का पाठ किया। वह अपने पाठ के लिए अतिरिक्त समय चाह रहे थे, लेकिन समय की कमी के कारण ऐसा हो न सका। प्रज्वल ने कुछ छोटी कविताएँ, जैसे ‘दृष्टि दोष’, ‘पीठ पीछे’ शीर्षक की कविताएँ पढ़ीं और समय पर अपना पाठ समाप्त किया। ग़ौरतलब है कि प्रज्वल इस प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर थे। इसके बाद प्रदीप्त ने अपनी कविता पढ़ी। उनके वाचन से लग रहा था कि वह जल्दी-जल्दी अपना सब कुछ पढ़ने को आतुर हैं। अधिक समय लेने के कारण उनको भी बीच में रोकना ही पड़ा। इन सबके बीच संचालक की सराहना करनी होगी, जिन्होंने बग़ैर संकोच कवियों को समय के लिए टोका। हिंदी के कार्यक्रमों की ऐसी आदत बन गई है कि अब पर्ची पकड़ाने से काम नहीं चलेगा। वक्ता के पास जाकर उनके बाईं ओर से दाहिने कंधे को थपथपाना ही अब सबसे सही तरीक़ा है। प्रदीप्त, जिन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया से पहला स्थान मिला था, उनके ठीक बाद प्राची ने अपनी कविता पढ़ी। प्राची की कविताओं को अलक्षित ज्यूरी (जिसमें ज्ञानेंद्रपति, गगन गिल और प्रियंवद शामिल थे) ने सबसे उपयुक्त माना और विशिष्ट कवियों के साथ कविता-पाठ करने का सम्मान दिया। प्राची की वाचन शैली को देखकर यह कहा जा सकता है कि वह किसी ख़राब कवि की कविताओं को भी अच्छी तरह पेश कर सकती हैं। रुमा निषाद अगली कवि थीं, जिन्होंने कुछ स्मृति-खुरेचक पंक्तियों जैसे—साथी तुम देना सूर्य की नरम किरण—के पाठ के बाद मंच विनय चौधरी को दिया। और इसके बाद अंतिम कवि सागर थे, जिन्हें तीसरा स्थान मिला। क्रिकेट मैच पर का बिंब लिए उनकी एक कविता जलसे में ख़ूब सराही गई।

इसके बाद ऑनलाइन वोटिंग का परिणाम पुराने लेकिन सनसनीख़ेज़ तरीक़े से जारी हुआ—पहले तीसरा, फिर दूसरा, फिर पहला। फ़ोटो-वोटो भी हुई और ग्रुप फ़ोटो भी, और फिर अगले सत्र की तैयारी होने लगी।

अगला सत्र एक गंभीर चर्चा का था, जिसका विषय था—‘कौन-सी परंपरा की खोज! आलोचना, सेंसरशिप और ट्रोलिंग का संसार’। इस सत्र की संचालक थीं स्मृति सुमन और वक्ता, या कहूँ कि सदस्य (क्योंकि यह अकादमिक वक्तव्यों जैसा कोई सत्र नहीं था, तो वक्ता कहने की कोई ज़रूरत नहीं) थे—बसंत त्रिपाठी, गगन गिल और बलवंत कौर। इनका परिचय इस प्रकार दिया जा सकता है कि गगन गिल हिंदी की महत्त्वपूर्ण कवि हैं। हाल ही के वर्षों में उन्हें अपनी काव्य-कृति ‘मैं जब तक आई बाहर’ के लिए 2024 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला है। बसंत त्रिपाठी पेशे से प्रोफ़ेसर हैं और मन से कवि, मन बहलाने को वह कहानी भी लिखते हैं और घोर अकादमिक विद्वान हैं। बलवंत कौर आलोचना पत्रिका की पहली स्त्री संपादक हैं। पिछले दिनों आई उनकी पुस्तक ‘स्मृति और दंश: विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी’ पाठकों द्वारा पसंद की गई है। स्मृति सुमन राजनीति विज्ञान के कैनन के सहारे सिनेमा की उधेड़बुन करती हैं। अब जब मैंने बलवंत को स्त्री विशेषण से जोड़ा है, तब मेरे मन में भी गगन गिल द्वारा उठाई गई आपत्ति आ रही है, लेकिन मैं इसे वैसे ही रखना चाहूँगा जैसा उत्सव में उनका परिचय देते हुए कहा गया था।

यह सत्र भी बातचीत की शक्ल में था, जहाँ पहला सवाल एक साझा सवाल था, बाकी सवाल एक-एक करके पूछे गए थे। अब अगर मैं सारे सवालों को यहाँ लिख दूँ तो वह प्रत्यक्ष दर्शकों से बेमानी होगी। यक़ीन मानिए, मेरे पास इस सत्र के पूरे नोट्स हैं, लेकिन मैं सब नहीं लिखूँगा, कुछ-कुछ ही लिखूँगा और उसमें से कुछ यह कि स्मृति ने प्रियंवद की कही गई बात में साहित्य के साथ सिनेमा को भी जोड़ा और कहा कि ट्रोलिंग अथॉरिटेरियन सोसायटी का एक प्रमुख टूल है, जिससे वह सत्ता को नियंत्रित करना चाहती है। साहित्य और सिनेमा इस नियंत्रण का प्रतिरोध करते हैं। और अपनी बात को पुख़्ता करते हुए इस साल की सबसे महँगी फ़िल्म ‘ओडेसी’ को लेकर आए विभिन्न वैश्विक आलोचकों के मत को बताती हैं और साथ ही ‘सतलुज’ और ‘होमबाउंड’ का संदर्भ भी जोड़ती हैं।

अपने प्रश्न के लिए भूमिका तैयार करने के बाद वह सदस्यों से पहला सवाल पूछती हैं—आलोचना (जिससे उनका अर्थ गंभीर आलोचना से था) के पास ट्रोलिंग से निपटने के क्या टूल हैं?

इसके जवाब में बसंत ने ट्रोलिंग और आलोचना में अंतर बताया और कहा कि कला या रचना अपनी उपस्थिति में याद की जाती है और आलोचना उसी उपस्थिति को रेखांकित करती है। बलवंत इस सवाल के जवाब में कहती हैं, ट्रोलिंग कोई नई बात नहीं है, लेकिन आज उसे गति सोशल मीडिया के कारण मिली है। गगन का कहना था कि फ़ेसबुक आदि पर न होने के कारण उन्हें इसका कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं है, लेकिन रचना में यदि शक्ति है तो वह ट्रोलिंग के पार, आलोचना के लिए तैयार रहेगी। डिजिटल साहित्य को लेकर पूछे गए सवाल पर बसंत ने कहा कि डिजिटल साहित्य किस डिवाइस पर पढ़ा जा रहा है, ये बहुत मायने रखता है।

कला इस समय एक जाइंट AI का सामना कैसे करेगी? इस सवाल पर बलवंत ने निश्चिंतता दिखाते हुए कहा, AI अपने आप में त्रुटिहीन होगा और यही उसकी सबसे बड़ी त्रुटि रहेगी। बाक़ी हिंदी साहित्य का अधिकांश डेटा डिजिटल रूप में नहीं है, इसलिए हिंदी के विषय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता अभी बहुत पीछे है।

सत्र का अंतिम सवाल गगन से था कि जब समाज ने पाबंदी (सेंसरशिप) को इतना अधिक आत्मसात कर लिया है, तब आप कबीर या अक्का महादेवी को कैसे देखती हैं? जवाब का संक्षिप्त प्रारूप यह था कि कवि का काम समाज को घेरकर संबोधित करना नहीं है। यदि कवि ठीक से कविता तक पहुँच बनाता है तो समाज ख़ुद उसका अनुसरण करेगा। यह जवाब गीता के श्लोक जैसा था—

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते

सर्वमंगल की कामना के साथ यह सत्र समाप्त हुआ और मंच व्यवस्था फिर से उत्साही वालंटियर के हाथों में आ गई। समादृत कवियों में रुचि न लेने वाले दर्शकों का जत्था बाहर चल गया था और कवियों के परिचय से सत्र की शुरुआत हुई। कविता-संध्या सत्र का संचालन सबाहत कर रही थीं।

सबसे पहले कविता प्राची ने ‘प्लीज मुझे बिठा लीजिए’, ‘असहाय विचार’, ‘कटहल’ आदि कविताओं का पाठ किया। वीरू सोनकर ने अपनी लंबी कविता‘वे अकाल के दिन थे’ का पाठ किया, जिसकी कुछ पंक्तियों ने नोट्स में जगह बनाई—

शून्य होने से मृत होना बहुत अलग है,
न काटे जाने वाले दिनों में याद आए पुरखे...

इसके बाद जोशना बैनर्जी आडवानी ने ‘चाय’, ‘सहायिका का मर जाना’ जैसी कविताओं का पाठ किया। उनकी एक कविता ‘मुझे ब्लॉक करने के बाद’ से दर्शक दीर्घा के जेन ज़ी ने संवाद बनाया और प्रोत्साहन दिया। उस कविता की यह लाइन कोट कर रहा हूँ, जिससे यह बताने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी कि मैं भी उसी जमात का हूँ—

दूर होने के लिए ब्लॉक करना ज़रूरी नहीं,
ब्लॉक करने के लिए पहले दूर होना सीख लो।

विवेक निराला अगले कवि थे, जिन्होंने कुछ बहुत छोटी कविताओं के बाद अपने पदों का पाठ किया। इसके लिए उन्होंने यह डिस्क्लेमर दिया कि मैं पुराने शिल्प में नई बात कहने की कोशिश करूँगा। कहना न होगा कि ‘ऊधो असंसदीय मत बोलो / जिसका देखो पड़ला भारी, उसी के तुम होलो!’ जैसे पदों ने उनकी कोशिश को पूरा किया।

गगन गिल ने कविता का पाठ शुरू करने से पहले कुछ बात कही, जिसे इस शिल्प में कहा जा सकता है कि विवेक के बाद गगन की कविता को सुनना ठीक वैसे है जैसे रंपत की नौटंकी देख-सुन रहे किसी विद्यार्थी को पढ़ने बिठा दिया जाए। ख़ैर, गगन गिल ने अपनी कविता पढ़ी, लेकिन इसी बीच मैं कुछ और करने लगा था तो आगे उनका पाठ ठीक से सुन नहीं पाया। हालाँकि इस रिपोर्ट की पूर्व योजना के चलते मैंने अपने दो साथियों कीर्ति, सृष्टि से कहा था कि वे कविताओं का सत्र ध्यान से सुनती चलें। उन्होंने बताया कि ‘थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए’, ‘यही घूँट काफ़ी है’, ‘कोई बना रहा है तुम्हारी प्रतिमा’, ‘वही दाना देना प्रभु जिस पर मेरा नाम हो’ शीर्षक की कविताएँ गगन ने पढ़ीं।

इसके बाद समादृत कवि ज्ञानेंद्रपति ने अपनी कुछ अप्रकाशित कविताओं, जैसे ‘नसीहत’, ‘एक हँसमुख तस्वीर’ और ‘कुंभग्न’ कविता का पाठ किया। इसके बाद लोगों ने ज्ञानेंद्र जी से उनकी बहुचर्चित कविता ‘ट्राम में एक याद’ पढ़ने की गुज़ारिश की। इस गुज़ारिश की पहली पहल सूर्य नारायण ने की और इसका अंतिम सफल प्रयास हरि कार्की ने कविता का लिखित प्रारूप उपलब्ध करवाकर किया।

फिर क्या था, एक तरफ़ ज्ञानेंद्रपति और उनका पाठ, दूसरी तरफ़ इलाहाबाद और उसकी अपनी-अपनी चेतना। इस पाठ के साथ-साथ उनके द्वारा दी गई नसीहत भी हवा में जाती रही कि इसे प्रेम कविता मानकर न पढ़ा जाए। कविता का समापन ऑडिटोरियम में standing ovation के साथ हुआ। 40 साल पुरानी कविता और उसका इतना क्रेज़ देखते बनता था।

कलकत्ता की ट्राम से गुज़रते हुए हम बाहर आए, जहाँ कुछ तो गड़बड़ है की शक्ल में पानी बरस चुका था। ‘हिन्दवी’ ने मेज़बान शहर की मेहमाननवाज़ी का बंदोबस्त रिफ्रेशमेंट और बुक स्टॉल के रूप में किया था। मेज़बानों ने रिफ्रेशमेंट को हाथों-हाथ लिया, बुक स्टॉल पर नज़रों से मिलते हुए चले। बाहर निराला, महादेवी, वीरेन डंगवाल, मुक्तिबोध के अलंकारिक पोस्टर लगे थे और ‘हिन्दवी’ की एक खुली खिड़की भी थी।

जलपान के बाद उत्सव का अंतिम सत्र संगीत संध्या का था, जिसे संतोष झा और उनके साथी प्रस्तुत कर रहे थे। महादेवी की कविता ‘पंथ रहने दो अपरिचित’, त्रिलोचन की कविता ‘पथ पर चलते रहो निरंतर’, निराला की कविता ‘गहन है यह अंधकारा’ जैसी कविताओं की उन्होंने संगीतमय प्रस्तुति दी।

मेरे लिए सबसे आश्चर्य की बात थी मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ के एक अंश ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन...’ का स्वर में पाठ किया, और अंत में वीरेन डंगवाल की कविता ‘इतने भले न बन जाना साथी’ का पाठ!

यह अंत यहीं पर हो जाता अगर किसी सजग दर्शक ने संतोष से गोरख पांडे की‘झकझोर दुनिया’ गाने के लिए अनुरोध नहीं किया होता। ख़ैर, कुछ अनुनय के बाद उन्होंने यह गीत भी प्रस्तुत किया और दर्शकों को भरपूर झकझोर दिया। उस समय वीडियोग्राफ़ी की मनाही थी, नहीं तो अभी तक वही लगातार स्क्रीन पर तैर रहा होता।

यह प्रस्तुति ‘हिन्दवी उत्सव-2026’ की आख़िरी प्रस्तुति थी। इसके बाद धन्यवाद ज्ञापन की औपचारिक प्रक्रिया के लिए अमितेश कुमार को मंच पर बुलाया गया। उन्होंने इसे और अधिक नीरस न बनाते हुए निराला की कविता ‘स्नेह-निर्झर बह गया है’ के एक अंश का पाठ किया, धैर्यवान दर्शकों और वालंटियर, जिनमें विप्लव, हर्ष, प्रखर, अमर, अनंत, नंदिनी, सृष्टि, साक्षी, विष्णु जैसे जुझारू विद्यार्थी थे, का शुक्रिया अदा किया, हिन्दवी की टीम को इलाहाबाद के चुनाव हेतु आभार जताया और प्रवीण शेखर को कहा—धन्यवाद!

संगीत संध्या में संतोष झा के बुशर्ट का रंग कुछ दिन पहले हुए शहर में हुए कार्यक्रम ‘छात्रों की गूँज’ के मुख्य वक्ता के शर्ट की याद दिला रहा था और यह यक़ीन करने को कह रहा था कि—

जनता के आवे पलटनिया
हिलेले झकझोर दुनिया,

कृतघ्न होने की आशंका को दूर करने के लिए एक ज़रूरी बात कि मैंने यह पूरी रिपोर्ट अपने साथियों के सहयोग से लिखी है, जिन्होंने हवा से बहते शब्दों को ठीक अर्थों में सहेजने में सहायता की। इसके लिए विशेष रूप से सृष्टि और कीर्ति का धन्यवाद!

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