घर तक नहीं पहुँचता दुख
देवपालिक गुप्ता
28 अक्तूबर 2026
रविवार का दिन। छुट्टी का दिन। लेबर कॉलोनी। हर रविवार यहाँ त्योहार होता है। सभी मज़दूर अपने-अपने ठेकेदार से हाज़िरी कार्ड पर हिसाब कराकर अगले एक हफ़्ते की ख़ुराकी का पैसा लेकर बाहर ख़रीदारी कर रहे हैं—कपड़े, सब्ज़ियाँ, राशन। सबने आज इत्मीनान से नहाया है, कपड़े धोए हैं और अपनी पसंद की क़मीज़ पहनकर निकल पड़े हैं। आज धूल-मिट्टी, सीमेंट, जंक... इन सबसे दूर रहना है। आज दूर रहना है कंधे, माथे और हाथ के बोझ से। आज दूर रहना है डाँट से। दिन भर अपने-अपने घरों में बाबू, पापा, चाचा, काका, दादा कहकर पुकारे जाने वाले लोगों की पहचान यहाँ सिर्फ़ मज़दूर की है।
प्रेम करने की उम्र में, प्रेमिकाओं के गाँव का चक्कर काटने वाले लड़के, ज़िम्मेदारियों के बोझ तले परदेसी हो गए हैं। आज दिन भर बीड़ी सुलगाएँगे और विरह के गीत सुनेंगे। वे ख़ूबसूरत प्रेमी हो सकते थे। प्रेम में हँस सकते थे। देर तक रो सकते थे। लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही मज़दूरी की परंपरा से वे कैसे बच सकते थे?
एक मज़दूर पिता अपने बेटे से बात कर रहे हैं। वही मज़दूर, जिसे काम करते हुए ज़ुबान नहीं खोलनी होती है। उसे दिन भर हाथ-पाँव चलाने होते हैं। उसे बोलने की इजाज़त यह कहकर नहीं दी गई है कि उसकी बातों में समझदारी नहीं है। क्रांति रोकने का यही एक तरीक़ा है। वह अपने बेटे से बात करते हुए दुनिया का सबसे समझदार इंसान बन गया है। जिस जीवन को वह जी रहा है; उसमें बेटे को कभी न आना पड़े, इसके लिए हर कॉल पर वह अपने बेटे को तैयार करता है। हर रोज़ की मेहनत के बाद उसका यक़ीन और पुख़्ता होता जाता है कि जिस काम को वह दशकों से करता आ रहा है, उस दलदल में उसका बेटा नहीं फँसेगा।
एक पति अपनी पत्नी को समझा रहा है कि आज तनख़्वाह नहीं मिली... अगले हफ़्ते भेज दूँगा पैसा, तब सामान ख़रीद लेना। बच्चों का ख़याल रखना और माई-बाउजी का भी।
पति जिस शहर में रहता है, पत्नी ने उस शहर को कभी देखा नहीं है। हाँ, पास के शहर को उसने देखा है। शहर को लेकर उसके दिमाग़ में जो चित्र है, उसी शहर की किसी गली के किसी कमरे में उसका पति रहता है... और दिन भर वह अपने प्राण उसी कल्पना के रूम में अटकाए रहती है।
माँ फ़ोन पर है। बेटा कहता है कि मैं पैसा भेज देता हूँ, शहर जाकर किसी डॉक्टर को दिखा लेना।
माँ कहती है कि नहीं, मैं ठीक हूँ। तुम अपने खाने-पीने पर भी ध्यान देना। ठंड बहुत है, कुछ कपड़े ले लेना।
माँ को लगता है कि जितनी अधिक बात होगी, बेटे का उतना अधिक पैसा लगेगा। अनलिमिटेड दुनिया में उसकी दुनिया लिमिटेड है। माँ बेशर्त मोहब्बत करती है।
हर बार फ़ोन पर मज़दूर यही कहना चाहते हैं कि मैं लौट आता हूँ। गाँव में ही जोत लूँगा हल। माँ-बाप को वक़्त पर खाँसी की सिरप दूँगा। उनकी दवाइयों की गठरी सँभालकर रखूँगा। पत्नी और बच्चों को मेला दिखाने ले जाऊँगा। उनके साथ कुछ दिन रहूँगा, बिना अगले दिन की मज़दूरी की चिंता किए। लेकिन ये सब कहने से पहले ही सामने से आवाज़ आती है : “ख़ुश हो न?” और वे अपने भीतर लौटने की सारी इच्छाओं को समेटकर कहते हैं : “हाँ, मैं ठीक हूँ।”
फ़ोन कट जाता है। उधर घरवाले तसल्ली कर लेते हैं कि उनका अपना ठीक है, इधर मज़दूर फिर उसी शहर, उसी काम और उसी अकेलेपन के हवाले हो जाता है। उसके पास कहने को कितना कुछ था, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी उसने अपने दुख को घर तक पहुँचने नहीं दिया। वह घर से दूर रहकर सिर्फ़ रोटी नहीं कमाता, अपने हिस्से का दुख भी अकेले उठाता है; ताकि घर में रहने वालों की नींद न टूटे।
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