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दो फ़ुटिया जीभ का चरित्र

एक दिन सोच रहा था दोमुँहा क्या होता है? बहुत सोचने के बाद मैंने जवाब पाया कि होता होगा कोई ऐसा जीव जिसके दो मुँह होते होंगे। किंतु क्या ऐसा संभव है? एक पेट के लिए दो मुँह! दरअस्ल में ग़लत राह में सोच रहा था। एक पेट के लिए दो मुँह होना तो प्रकृति की सृष्टि को उलट-पलट कर देने जैसा होगा।

फिर भी यह तथ्य भी उतना ही सत्य है कि एक पेट के लिए भले प्रकृति ने एक ही मुँह लगाया हो, जो केवल चरने के काम आता है; किंतु आज ऐसे द्विटाँगधारियों की कमी भी नहीं है, जो दो मुँह लगाए यत्र-तत्र, गाँवों, शहरों, विश्वविद्यालयों, धरती-आसमानों सब जगह बिना किसी रुकावट के अपनी दो फ़ुटिया जीभ लपलपाते हुए उचक रहे हैं। वे इस दूसरे मुँह का उपयोग चरने का जुगाड़ बैठाने में तो करते ही हैं, साथ ही जूते खाने से बचने में और जूते चाटने में भी इसका बख़ूबी इस्तेमाल करना जानते हैं।

कभी-कभी दो विपरीत जगहों के अंग विशेषों को चाटने की नौबत आ जाए तो उनके दोनों मुँह इस धर्म संकट से उबारने में बड़े काम आते हैं। कभी-कभी वे बहुमुखी भी हो जाते हैं और ज़रूरत पड़ने पर बिन पेंदी के लोटे हो जाने में भी संकोच नहीं करते। इनका कोई भरोसा नहीं, कब-किधर-कैसे लुढ़क जाएँ। ऐसे लोटों की उपयोगिता केवल मल त्याग के समय ही होती है, वरना पड़े रहते हैं किसी कोने में। लेकिन इतने पर भी वे स्वयं को पेयजल पात्र का सगा बताने से नहीं चूकते।

ख़ैर, छोड़िए लोटे को; हम दो मुँहों पर लौटते हैं। यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो हम पाएँगे कि दोहरा बर्ताव करने वाले लोगों को दोमुँहा कहा जाता है, जिनका कोई सासरा-मायका नहीं होता। वह इसके मुँह पर उसकी, उसके मुँह पर इसकी—मतलब श्वान शैली के श्रेष्ठ अनुगामी होते हैं और दोनों तरफ़ जीभ लपलपाते हुए चरण चाटने के श्वान सिद्धी कार्य को भली-भाँति अंजाम देते रहते हैं। मगर ये श्वान पुरूष ज़्यादा देर तक धोखा नहीं दे पाते, अब श्वान कितने भी होशियार क्यों ना रहे, रहेंगे तो श्वान ही। मानव थोड़े हो जाएँगे।

फिर भी ये विचित्र प्राणी, दोहरा चरित्र ऐसी कलाकारी के साथ प्रस्तुत करेंगे और दिखाएँगे कि इनसे बड़ा प्रिय-हितैषी कोई हो ही नहीं सकता। ये नहीं जानते कि लकड़ी की हाँडी कहाँ दूसरी बार चढ़ पाती है। यही परिणाम हर श्वान शैली के अनुगामी दोमुँहों का होता है। यह लोग आपको प्रत्येक क्षेत्र में लटकते-भटकते मिल ही जाएँगे। कभी श्रेष्ठ उपदेशक बनकर बताते फिरेंगे कि उनको छोड़कर किस-किस के झाँसे में नहीं आना है।

सावधान! वे अब कविता बनाना भी सीख रहे हैं। नारी यातना उनका प्रिय विषय है। वे बहुत-सी नारियों के उद्धारक बने हुए हैं। दस-पाँच से तो बराबर फ़ोन पर वार्तालाप होता रहता है। नग्न चित्रों का आदान-प्रदान चलता रहता है। इन चित्रों को देखकर वे ऐसे स्खलित हो जाते हैं—जैसे लोक कथाओं में देवता, अप्सराओं को देख हो जाते थे। वे कविता को जीने का कट्टर दावा करते हैं और उनके जीवन में यह दिखाई भी देता है। ऐसे परम-विशिष्ट व्यक्तियों के लिए कवि रामदरश मिश्र की यह कविता सटीक बैठती है :

“कौन हो तुम?” पत्नी ने पूछा
“मैं गाँव से आई हूँ
मुझे अपने उनसे मिलना है
जो मुझे अनाथ करके चले आए हैं”
कवि ने स्वर पहचान लिया
चिल्लाकर बोले—“यह कौन है प्रभा जो काँय-काँय किए जा रही है भई,
भगाओ उसे कुछ दे-ओकर
मेरी कविता की लय टूट-टूट जा रही है।”

अच्छा हुआ यह लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है, नहीं तो वे यह दावा कर देते की शासकों को तो बहुस्त्रीशयन का जन्मजात अधिकार है। वे इस बात का दावा बस नहीं कर पा रहे, बाक़ी व्यवहार में तो इसे उपयोग में ला ही रहे हैं। यह लोग नेताओं की संकर नस्ल के जंतु होने के कारण मरीचिका का प्रदर्शन करना भी भली-भाँति जानते हैं। मगर इन श्वानपुरुषों, पनहीपुरुषों को कौन समझाए कि जब सत्य का दंड चलता है, तो ऐसे कीड़े-मकोड़ों को इनकी वास्तविक जगह पर यथावत विसर्जित कर दिया जाता है। यदि वे किसी विश्वविद्यालय में होते तो कवि ज्ञानेंद्रपति ज़रूर बोल उठते—

वे जो ‘सर’ कहाते हैं
धड़ भर हैं
उनकी शोध-छात्राओं से पूछ देखो

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दुर्गेश कुमार सजल को और पढ़िए : दो ग्रह, दो भाषाएँ : पृथ्वी और मंगल के साहित्य का अनुवाद-विमर्श

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