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दो ग्रह, दो भाषाएँ : पृथ्वी और मंगल के साहित्य का अनुवाद-विमर्श

पिछले दिनों गाँव में परफैरा हुआ, कुछ लोग मच्छी मार्केट लगाए बतिया रहे थे। वे क्या बात कर रहे थे और उसका अर्थ क्या था? कुछ नहीं सूझ रहा था! वे या तो गाली-गलौज कर रहे थे या फिर अर्थ पर ध्यान दिए बग़ैर वाग्विलास कर रहे थे। नज़दीक जाकर ध्यान से सुनने की कोशिश की, तब हल्का-हल्का कुछ समझ पड़ा। संभवतः वे सब किसी संगोष्ठी से ज्ञान प्राप्त करके आए हुए थे और उसी का भाँति-भाँति से वर्णन चल रहा था।

एक अधेड़ से पूछा तो बताने लगा, “बड़े-बड़े वक्ताओं ने तीन दिन तक ज्ञान बाँचा है। तुम क्या जानो संगोष्ठी क्या होती है? वहाँ देश-विदेश के ऊँचे-ऊँचे विद्वान अपने ऊँचे-ऊँचे और लंबे-लंबे विचार रखते हैं।”

“कितना ऊँचे और कितने लंबे महोदय?”

“अरे ढीठ मज़ाक़ कर रहा है...”

“नहीं-नहीं मान्यवर! आप तो बुरा मान गए, कुछ और बताइए।”

“नहीं, भाग यहाँ से। तू उस ज्ञान के लिए पात्र नहीं है, दुष्ट!”

अब बड़ी समस्या उठ खड़ी हुई कि किससे पूछे? तभी बग़ल से एक शांत स्वभाव का दुबला व्यक्ति टाँग उठाते निकलता दिखा।

मैं मौक़ा देखकर पूछा, “अरे महोदय रुकिए, क्या आप इस किच-किच का कारण बता सकते हैं? जो यहाँ चल रही है।”

पहली बार किसी ने उनसे वास्तविकता, वास्तविक तरीक़े से जाननी चाही थी। चेहरा खिल गया। मुस्कुराते हुए बोले, “मुझे आप सज्जन सजग मालूम होते हैं। चलिए, वहाँ चौंतरे पर बैठकर विस्तार से बताता हूँ। दरअस्ल, मैं पत्रकार हूँ और वहीं से रिपोर्टिंग करता हुआ आ रहा हूँ...”

“अच्छा-अच्छा, याद आया! आज सुबह न्यूज़ पेपर पढ़ा था, आप काफ़ी अच्छा लिखते हैं। सारगर्भित रिपोर्ट छापी थी, आपने।”

“जी, धन्यवाद। लेकिन वह सब सही नहीं था, जो आपने पढ़ा।”

“तब सच क्या है?”

“हाँ, फिर सुनिए। तीन दिन तक सात सत्र चले। जो किच-किच आपने अभी-अभी सुनी, उसमें भौं-भौं, म्याऊँ-म्याऊँ, चींचीं-पींपीं, हैं-हैं-हों-हों, ढेंचू-ढेंचू और मिला दें—तो उद्घाटन सत्र से आख़िरी सत्र तक, पूरी संगोष्ठी का सोलह आने वर्णन हो जाएगा। शुरुआत के दिन ही मंगल ग्रह से, चाँद से और यात्रा-ख़र्च से बचने के लिए अड़ोस-पड़ोस से—काम चलाऊ, श्रेष्ठ, प्रसिद्ध, ख्यातिलब्ध, फ़लाँ पुरस्कार पाए, फ़लाँ फ़ेलोशिप वाले और बाक़ी आप ख़ुद जोड़ लें—वक्ता बुलाए गए थे।”

“यात्रा-ख़र्च से बचने के लिए?”

“अरे आप समझते हैं ना, कुछ लोकाचार भी तो होता है। 
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम...”

“जी, समझ आया। आगे सुनाएँ और आपने संगोष्ठी का विषय भी तो नहीं बताया!”

“जी, विषय था—‘पृथ्वी और मंगल ग्रह के साहित्य की अनुवाद-समस्याओं पर चिंतन’।”

“वाह कितना अच्छा विषय था, आगे क्या हुआ...”

“आगे... वही जो होता हुआ आपने अभी सुना था। पहले वक्ता ने दोनों ग्रहों के साहित्य को छुआ तक नहीं और अनुवाद पर इतना ज़ोर देकर कहता रहा कि—‘अनु’ चीत्कार कर ‘वाद’ की गोद में जा गिरा। बोलते हुए जैसे उसकी पकड़ ढीली पड़ती, वह ज़ोर देकर पकड़ जमाने लगता; तमाम तरह की ज़ोर-ज़बरदस्ती के बाद आख़िर उसे मौन धरना करना पड़ा। दूसरे वक्ता ने कहा कि हम और आप मंगल से परिचित हैं। सबकी कुंडली में मंगल होता है और माँ से श्रेष्ठ पृश्वी है। मैंने एक दिन लिखा था :

चारा कैंसे ढोंये, सखी री
चारा कैंसे ढोयें
उठ भुंसारे काग मिले तो 
बहुत अमंगल होय, सखी री 
बहुत अमंगल होय।

धरती चारा उगाकर हम पर एहसान करती है और उस चारे से ही कृष्ण को दूध मिल पाता था। यदि चारा न होता तो गाय न पलतीं और गाय न पलतीं तो कृष्ण न होते और कृष्ण न होते तो सूरदास किसका वर्णन अपने पदों में करते? भारी अमंगल हो गया होता।”

“इस तरह से तो सच में वही हुआ जो मैंने सुना था।”

“हो भी क्यों नहीं, संगोष्ठियों का यही तो हाल होता है—जो यहाँ हुआ। अब बारी आती है अगले वक्ता की, जिन्होंने पहले वाले वक्ता की बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि मित्र ने एक अच्छे विषय की ओर इंगित किया है। चारे की समस्या दिन-प्रतिदिन गहराती जा रही है। चारा नहीं मिलने से गाय-भैंस दूध नहीं दे रहीं, जिससे मिलावटी दूध मार्केट में चल रहा है। इसे पीकर सबका अमंगल हो रहा है। इसलिए हम सबको चारे की समस्या से सबसे पहले निपटना होगा। मैं मंगल-अमंगल की धारणा में विश्वास नहीं करता, ऐसी धारणाएँ मेरे प्रकाशन में बोरे भर कर पड़ी हैं। मित्रों और खासकर विद्यार्थियों, आप सबसे मैं यह कह देना चाहता हूँ कि आगे आइए और चरागाहों को बचाने में सहयोग कीजिए। वक्ता ने इतने आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखी कि संगोष्ठी में उपस्थित जनता सोच में पड़ गई और चारों तरफ़ ‘चारा बचाओ, चारा बचाओ’ की चीं-पुकार होने लगी। वक्ता महोदय ने भी गद्गद होकर माइक छोड़ दिया और जंग फ़तह करने की-सी फ़ीलिंग लेते हुए अपनी कुर्सी पर जा गिरे। वहाँ कुर्सी ही थी, जिसने चर्र होकर उसका प्रतिकार किया।

संचालक ने तुरत आकर मोर्चा सँभाला और वक्ता महोदय की शान में दो-चार क़सीदे पढ़े, उसके बाद अगले वक्ता को ससम्मान बुलावा भेजा। उन्होंने मंच पर आते ही वह कहा, जो हर वक्ता संबोधन से पूर्व कहता है। पूज्यनीय के चरणों में लोटनीय प्रणाम। उन्होंने पूर्व के वक्ताओं से भिन्न कुछ बात रखी और ज़ोर देकर ज़ोरदार तरीक़े से कहा कि मैंने इस विषय पर गहनता से अध्ययन किया है। मैं इस पर शोध कार्य भी करवा रहा हूँ। पिछले कुछ दिनों में मुझसे कुछ विद्यार्थी कहने लगे कि हमें उक्त विषय पर पर्याप्त अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं हो पा रही है। एक विद्यार्थी बताया, “अध्ययन सामग्री ने होने के कारण मैं अपनी गर्लफ़्रेंड को पढ़ाई में कुछ मदद नहीं दे पा रहा हूँ। दो सेमेस्टर से उसकी बैक क्लियर नहीं हो पा रही हैं। इसमें जितना दोष इस अध्ययन-व्यवस्था का है, उतना ही दोष इस पर सरल किताब न मिलने का भी है। किताब होती, तो उसका जेआरएफ़ भी निकलवा देता। मैं चमनपुर से पीएचडी कर रहा हूँ, वह मदनगवाँ में शोधार्थी बन बैठी है। मिलने के लाले पड़े रहते हैं। एक किताब लिख दीजिए जिससे हमारा प्रेम, परिणय तक तो खिसके। मुझे प्रेमियों की यह पीड़ा द्रवित कर गई, जैसे क्रौंच की पीड़ा ने आदिकवि को व्यथित कर दिया था। मैंने यह किताब बनाकर तैयार कर दी। यहाँ उपस्थित अतिथियों, विद्वज्जन, छात्र-छात्राओं, शोधार्थियों आप सब मेरी इस किताब से लाभ लीजिए। अंत में उन्होंने प्रकाशक और दुकान का नाम बताकर ख़ुद की पीठ ख़ुद ही ठोकी और वक्तव्य बंद किया। संचालक महोदय वक्ताओं को इसी तरह बुलाते रहे और एक के बाद एक वक्ता, आती-जाती मालगाड़ी की तरह गुज़रते रहे।”

ख़ुद को पत्रकार बताने वाले शांत स्वभाव का दुबले व्यक्ति की बातों सुनकर मेरे सामने वह दृश्य झूल-सा गया जिसमें किसी गाड़ी से कोयला गिरता है, किसी से पेट्रोल गिरने के बाद आने वाली गंध आती है और कभी-कभी यूरिया, डी.ए.पी. भी फैल जाता है।

बीच में यह ख़बर भी लगी कि उजड्ड विद्यार्थियों का झुंड, अतिथियों के लिए लाई गई पानी की सारी बोतलें ले उड़ा। किसी ने किट दबा ली, किसी ने फ़ाइलें। पूरे तीनों दिन यही तमाशा मचा रहा। अंत में संगोष्ठी में व्यक्त उद्गारों को—जैसा कि परंपरा है—अद्वितीय एवं महत्त्वपूर्ण माना गया। इस तरह ‘पृथ्वी और मंगल के साहित्य की अनुवाद-समस्याओं पर चिंतन’ करते हुए संगोष्ठी का समापन हुआ। आगे का हाल आप देख सुन ही चुके हैं।

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