धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : आषाढ़ का पहला दिन और...
गणेश पाण्डेय
30 जून 2026
आज आषाढ़ का पहला दिन है। इस अवसर पर हम ‘हिन्दवी बेला’ पर वह कर रहे हैं, जो इससे पूर्व हमने कभी नहीं किया—एक उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन। यह हमारे लिए बहुत हर्ष और उल्लास का प्रसंग है कि इस काम की शुरुआत बहुत ईमानवाले कवि-आलोचक गणेश पाण्डेय के तीसरे उपन्यास ‘जंकामंका गैंग’ से हो रही है। अब से प्रत्येक मंगलवार आपकी मुलाक़ात ‘हिन्दवी’ पर ‘जंकामंका गैंग’ से हुआ करेगी... पढ़िए-जुड़िए-बताइए...
|| जंकामंका गैंग ||
अद्विका, अयांशी, अयंतिका और आश्वी के लिए
एक
“पृथ्वी की सबसे काली और लंबी रात है। ओह! कितनी काली और कितनी लंबी रात है। न अपने दोनों हाथ हिलते-डुलते देख पा रहा हूँ, न अपने सधे हुए क़दम, न जिसकी मूठ मेरे हाथ में है, उस आगे बढ़ती हुई छड़ी को... और काली और काली होती हुई रात है। सामने वक़्त का बड़ा-सा आदमक़द आईना है और एकदम-से मुर्दा है, जिसमें न मेरा अक्स दिख रहा है और जो न मेरी आँखों में कोई चमक पैदा कर पा रहा है, न मेरी आँखें ख़ु़द को देख पा रही है। एक ऐसी महाठंडी और महाकाली रात है, जिसमें मुझे वक़्त की सबसे सख़्त दीवार पर अपने सिर से टक्कर मारकर चिंगारी पैदा करना है। ख़ुद को नाउम्मीदी और नाकामी की इस रात को भेदकर बाहर निकालना है, फिर से अपने बाज़ुओं को उठते और तलवार चलाते हुए देखना है। देखना है : वक़्त की दीवार कितनी दूर है, कितनी पास है। कहाँ से आ रही है, दुश्मनों की फ़ौज की आहट और उनके लाव-लश्कर का शोर, हाथियों के चिंघाड़ने की आवाजे़ं, घोड़ों के दौड़ने की आवाज़ें, उनके सवारों के ललकारने की आवाजें। ये आवाजे़ं बाहर से आ रही है या मेरे भीतर से! कुछ और भी है, कुछ और।”
जीवन की सबसे लंबी रात का अँधेरा है। अँधेरे का पहाड़ है। अँधेरे की इस लंबी सुरंग में बड़बड़ाते हुए चौहत्तर साल का एक दुबला-पतला शख़्स, जिसके दाएँ हाथ की हथेली में एक लंबी-सी छड़ी की मूठ है। वह लंबे-लंबे डग भरता हुआ बेख़ौफ़ चला जा रहा है। उसके पैर उसके साथ चल रहे हैं—अँधेरे के पहाड़ को ठोकर मारते हुए, चलते चले जा रहे हैं। सुरंग के पिछले मुहाने से कोई रोशनी की पतली-सी लकीर पीछा करते हुए अँधेरे के पहाड़ को चीरकर बार-बार उसकी देह में विलीन हो जा रही है, कभी उसकी आँखों में समा जा रही है, कभी उसकी उँगलियों को चूम रही है, कभी उसके पैरों से लिपट जा रही है। यह सिर्फ़ रोशनी नहीं है... वक़्त की पीली रोशनी में लिपटी कोई चालीस बरस की छोटी बेटी है, उसकी एक मद्धिम और रुआँसी आवाज़ है, जो लगातार उसका पीछा कर रही है, उसे मथ रही है, विकल कर रही है :
“क्या मिला पापा, क्या, क्या दिया आपको आपके इस जुनून ने, आपने ख़ुद को बर्बाद कर लिया, हाईबीपी, शुगर, स्कीमिक अटैक, थायरायड, साँस फूलने के साथ जबरदस्त एलर्जी का पहाड़ अलग से, तीन बार इनहेलर लेना, ओह लंबी खाँसी जब आपके सीने को झिंझोड़ती है तो लगता है कि कोई रेड़ का पेड़ है जो अभी ढह जाएगा, आपने तो जीवन में कभी अपने काम का पुरस्कार नहीं चाहा, फिर यह बुरी सौग़ातें क्यों, आपने क्यों किया यह सब, आपने क्यों चुना पापा क्यों, अँधेरे का यह पहाड़ और कँटीला पथ, क्यों आपके लिए आपका जुनून इतना प्रिय था कि आपने अपने जीवन में अपने सुख और अपने बच्चों के सुनहले भविष्य की चिंता नहीं की! कोई बात नहीं पापा, कोई बात नहीं, अब आपके बच्चे ख़ुद को सँभाल सकते हैं, आपको भी सँभाल सकते हैं, आपके जुनून ने आपका कोई मोल नहीं लगाया, आपके ज़माने ने आपको तज दिया, तो कोई बात नहीं पापा, आप हमारे लिए अनमोल हैं, हम आपके साथ हैं, हम आपके जुनून के साथ हैं, आपकी लड़ाई के साथ हैं, हम आपके अँधेरे और उजाले के साथ हैं। आपके जुनून के रास्ते में हम कभी नहीं आएँगे, हमेशा आपका साथ देंगे, बस आप ख़ुद को सँभालो, थोड़ा सेहतयाब हो जाओ, आप तो कभी इतना कमज़ोर नहीं थे पापा, फिर से अपने भीतर ख़ूब ताक़त इकट्ठी करो पापा। कुछ समय के लिए, छोटा-सा ब्रेक लो, न कहीं लड़ाई भागी जा रही है, न दुश्मन। पहले रोग से देह की लड़ाई जीत लो, पापा!”
बेटी की बातों से उस शख़्स की आँखें इतनी गीली हो गई हैं कि कुछ देख नहीं पा रही हैं। वे अपने भीतर से फूटते हुए सोते को भी नहीं देख पा रही है, यह भी नहीं देख पा रही हैं कि सोते से बह क्या रहा है—आँसू हैं या जीवन-रस है। शायद आँसू हैं, शायद जीवन-रस है, शायद कुछ और...
यह शख़्स, सिर्फ़ पैंतालीस, तैंतालीस और चालीस बरस के बच्चों का पापा ही नहीं है, मेरा अभिन्न मित्र भी है, मेरे दिल का आधा हिस्सा है, वह दुखी होता है, तो मेरी आँखें नम हो जाती हैं; वह ख़ुश होता है, तो मैं खिल जाता हूँ। मेरा दोस्त है तो है ही, यूनिवर्सिटी के हज़ारों बच्चों का उदय सर है। अपने विद्यार्थियों का इतना बड़ा उदय सर हो गया है कि मैं भी कई बार भूल जाता हूँ कि वह मेरा दिलजानिया है या उदय सर! मैं भी उदयसर-उदयसर कहने लगता हूँ। उदय सर को आपने कभी क्लास में या बाहर बोलते हुए सुना होता, क्या बोलते थे, अब तो चुप रहते हैं या ऐसे ही कभी-कभी बड़बड़ाते रहते हैं, जैसे इस वक़्त ख़़ुद से बात कर रहे हैं :
‘‘शायद मेरी रूह से पैदा कोई बीनाई है,
जो मेरी आँखों में उतर आई है और मैं
वह सब जस का तस देख पा रहा हूँ।’’
उदय सर, सीधे जमुआर नाले को देखते हैं और ख़ुद को उसके लोहे के पुल पर पाते हैं। इस पुल को किसी डोम राजा ने तीक्ष्णकंटक मठ के पीठाधीश्वर स्वामी तीक्ष्णकंटक महाराज के आदेश पर बनवाया था। इस जमुआर नाले में जितना पानी है, उससे लाख गुना ज़्यादा, इस समय उस पर गिरता हुआ दिन का उजाला है। ग़ज़ब का उजाला है। पता नहीं यह उजाला सूरज का उजाला है या तीक्ष्णकंटक बाबा का तेज है, जो धरती पर बाबा की कृपा बनकर पर बरस रहा है। उदय सर कब अपने भीतर के अँधेरे से निकलकर अपनी मिट्टी को छूकर उसे अपने माथे से लगाने लगे, उन्हें पता ही नहीं चला। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब उदय सर अपनी मिट्टी में लोटने की इच्छा करने लगे हों। उनके जीवन में चाहे कोई जादू न हो, लेकिन उन्हें हमेशा लगता है कि इस मिट्टी में जादू है। माँ, बुआ, बाबूजी के पैरों की छाप और उनका पूरा वुजूद जैसे कण-कण में समाया हुआ है। जमुआर नाले के एक ओर श्मशान है, जहाँ इस जीवन से मुक्ति मिलती है, मोक्ष का ठौर है। दूसरी ओर आधा कोस पूरब चलने पर साखू और शीशम का विशाल जंगल है, उसी में जमुआर के किनारे ख़ूब ऊँचाई पर बना तीक्ष्णकंटक बाबा का विशाल मठ है।
यह मठ पहले नहीं था। बाबा इस तरह मचान पर वास नहीं करते थे। गाँव की पुरखिनों ने बाबा को सबसे पहले बबूर बाबा के रूप में देखा और काँटा बाबा के रूप में जिसका गुण गाया। नित्य की भाँति पुरखिनें भोर में जग गई थीं। वह कोई आघ्यात्मिक बेला थी। सूर्य भगवान् प्रकट होने को थे कि बबूरबाबा एक बबूल के नीचे उनसे पहले प्रकट हो गए थे। जंगल में कुछ पेड़ बबूल के भी थे : बाबा चाहते तो साखू नहीं, शीशम के नीचे भी प्रकट हो सकते थे, लेकिन इस महान आध्यात्मिक घटना के लिए उन्होंने कँटीले बबूल के पेड़ को चुना था। पुरखिनों ने देखा कि सूर्य भगवान् अपनी कला दिखाते, इससे पहले बबूर बाबा उर्फ़ बबूल बाबा उर्फ़ काँटा बाबा उर्फ़ तीक्ष्णकंटक बाबा ने उन्हें चकित करने वाला खेला कर दिया था। कृशकाय, धूल-धूसरित, जटा-जूट धारी, शिखा से पैरों के नख तक बबूल के काँटों से युक्त और कटि-प्रदेश में मृगछाला लपेटे कोई आध्यात्मिक शक्ति शीर्षासन की मुद्रा में बिना आँख खोले, बिना होंठ हिलाए, बिना साँस खींचे या छोड़ें अर्थात् कोई संकेत किए बिना, पुरखिनों को किसी अदृश्य-शक्ति से अपनी ओर खींच रहा है और वे खिंची चली जा रही हैं, चली गईं। बबूर बाबा ने उन्हें अपनी देह में चिपके बबूल के काँटों के भंडार से एक-एक काँटा दिया और पुरखिनें धरती पर शीश नवाकर लौट आईं। देखते-देखते अड़ोस-पड़ोस की पुरखिनों और पुरखों का ताँता लग गया। जमुआर के तट पर शीर्षासन से शीशम और साखू से बने भव्य मचान पर प्रतिष्ठित होने में कोई ख़ास समय नहीं लगा।
समय, थोड़े ही समय में तीक्ष्णकंटक बाबा का दास बन गया था। उनके दरबार में एक पैर पर खड़ा रहता था। जिसे देखो, बाबा के दरबार में पहुँचना चाहता था, खड़ा होना चाहता था। भक्तों के दुख के काँटे को बाबा पलक झपकते बबूल के काँटे से निकाल देते थे। निकाल देते हैं। न जाने कहाँ-कहाँ से भक्तों का सैलाब उमड़ा रहता है। वृद्ध, अधेड़, युवा और बच्चे, सबकी अपनी-अपनी कामनाएँ हैं, अपने-अपने सुख और दुख-मोचन की चाह। आज का तीक्ष्णकंटक धाम, पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख तीर्थ है। धाम के बाहर नई-नई गाड़ियों की क़तारे हैं, बस, टैक्सी, आटो का रेला है। हुजूम है, जीवन की नित नई कामनाओं का मेला है। अमीर-ग़रीब, राजा-रंक, स्त्री-पुरुष, सबके लिए काँटा बाबा उर्फ़ तीक्ष्णकंटक बाबा का मठ खुला हुआ है।
उदय सर के पिता पंडित शीतल प्रसाद सुकुल, तीक्ष्णकंटक बाबा की महिमा का वर्णन करते नहीं थकते थे—“सूबा तो सूबा, दिल्ली दरबार तक बाबा का आशीर्वाद लेने के लिए उनकी कुटिया में नतमस्तक होता था। जो भी गुज़रता था इधर से, उसके पैर आप से आप तीक्ष्णकंटक मठ की तरफ मुड़ जाते थे। पैर तो पैर, ड्राइवर न चाहे तो भी, साइकिल क्या, रिक्शा क्या, जीप क्या, कार क्या, बस और ट्रक का पहिया आप से आप मुड़ जाता था। इतना ही नहीं, पंडित शीतल प्रसाद तो यहाँ तक बताते थे कि अपने देश का हवाई जहाज़ तो पायलट की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मुड़ता ही था, दूसरे देशों और दूसरे लोक तक के विमान मुड़कर मत्था टेके बिना आगे बढ़ ही नहीं पाते थे। बादल और हवा किस खेत की मूली थे!”
पंडित शीतल प्रसाद बताते थे कि बाबा बस धीरे से कहते थे—“काहो बादल?” और बादल रिमझिम फुहारों के साथ दंडवत्। बाबा कहते—“बच्चा, सब खेत लोग तुमसे बहुत दुखी है।” इतना कहते ही बादल झमाझम पानी के साथ हर जगह हाज़िर। बाबा कहते—“का हो हवा?” शीतल-शीतल मलयानिल पल भर में बाबा के चरणों में। इतना ही नहीं, बाबा के डपटने पर सूर्य देवता एक पैर पर खड़े होकर प्रणाम की मुद्रा में आ जाते थे। चंद्रमा का मुखमंडल स्याह हो जाता था। खेत बाबा के कहे मुताबिक़ फ़सल पैदा करते थे। बाबा अनमने ढंग से देखते तो कम, ख़ुश होकर देखते तो भरपूर, उधर न देखने का मतलब सूखा। पेड़ भी ऐसे ही फल देते थे। प्रकृति तो प्रकृति, मनुष्यों और पशु-पक्षियों के बच्चे तक हिसाब से पैदा होते थे। क्षेत्र-जवार के आदमी जीते-मरते तक बाबा के हिसाब से थे। ऐसे थे बाबा। और ऐसा था बाबा का आध्यात्मिक हिसाब-किताब। गाँव-जवार ही नहीं आस-पास और दूर-दराज़ तक के लोगों को पता था कि बाबा कब किस दिन किस दान से प्रसन्न होते थे। बाबा जितना फलदान से प्रसन्न होते थे, उतना ही गोसेवा और श्रमदान से। मतदान से भी बाबा उतने ही प्रसन्न होते थे। बाबा सबका दान स्वीकार करते थे। सबको आशीर्वाद देते थे। क्या भला और क्या बुरा। क्या राजा क्या रंक। क्या पुलिस क्या चोर-डाकू। क्या देशभक्त क्या ग़द्दार। जो बाबा का भक्त था, बाबा उसके लिए जो कुछ कर सकते थे, करते थे। बाबा जो कुछ करते थे बड़े हिसाब-किताब से करते थे। बाबा अपनी दाढ़ी बढ़ाते थे तो इस हिसाब से कि दाढ़ी बढ़े तो पर लगे कि स्थिर है। आहार में बाबा फल-फूल दूध-सूध, मेवा-सेवा, राबड़ी-साबड़ी सब लेते थे... पर लगता कि बाबा कुछ नहीं लेते। बाबा धरती पर भुंइधरे में टाइम-टाइम से रहते थे पर कोई भक्त चाहकर भी नहीं जान पाता, बाबा कब विश्राम करते थे, कब जीव-जगत के कल्याण के लिए चिंतन-मनन करते थे, देखना तो ख़ैर मुमकिन ही नहीं था। बाबा टाइम-टाइम से मठ के अग्रभाग में मचान पर बेशक़ीमती लकड़ी और अतिकोमल रुई से बनी गद्दी पर जब विराजमान होते थे, तभी भक्त लोग बाबा को साक्षात् देख पाते थे। भक्तों के लिए उनकी आँख की सीमा ख़ुद बाबा ने तय की थी, पंडित शीतल प्रसाद सुकुल तो यह भी बताते थे कि बाबा ने अपने भक्तों के दिमाग़ की सीमा भी तय कर दी थी। भक्तों के दिमाग़ और आँखों में बाबा की गद्दी सदैव विराजमान रहती थी। बाबा कब अदृश्य हो जाएँगे और कब कहाँ प्रकट, कोई भी चीज सूँघकर कुछ भी जान लेने वाले आस-पास के पशु-पक्षियों तक को भी यह पता नहीं रहता। भक्त लोग बाबा को जब भी देखते थे उनकी गद्दी पर देखते थे।
भक्त अपनी आँखों पर आस्था की सबसे मोटी पट्टी बाँधकर बाबा को जितना देख पाते, उतना ही देखते थे। देखते कहाँ थे, सिर्फ़ दर्शन करते थे। बस आराध्य की छाया को अपने हृदय के निकट होने का आध्यात्मिक अनुभव करते थे। उन्हें तो सिर्फ़ लगता था कि कुछ है, जिसे देख रहे हैं। बस! बाबा कब आहार लेते हैं, बाबा कब निद्रा में होते हैं, बाबा हगते-मूतते भी हैं कि नहीं और यह सब करते हैं तो कब, यह सब किसी भक्त ने जाना ही नहीं। पंडित शीतल प्रसाद सुकुल कहते थे कि सब यही जानते और समझते थे कि बाबा हवा खाते हैं, हवा पीते हैं और जो भी ग्रहण करते हैं, उसका त्याग नहीं करते। बाबा कभी सोते नहीं, सृष्टि के साथ अहर्निश जागते रहते हैं। पंडित शीतल प्रसाद तो यहाँ तक कहते थे कि बाबा जागते ही इसलिए हैं कि भक्त आराम से सदैव सोते रहें। पंडित शीतल प्रसाद सुकुल बताते थे कि पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ गाय के पवित्र ‘गोबर’ की पूजा होती थी, वहाँ-वहाँ तक तीक्ष्णकंटक बाबा का जस और प्रताप था। पंडित शीतल प्रसाद सब जानते थे, उन्हें सब बाबा ने स्वयं बताया था। ऐसा वे अपने प्रियजनों को बताते थे और पंडित शीतल प्रसाद यह सब शुभ मुहूर्त में बताते थे, उनका शुभ मुहूर्त गोधूलि-बेला में फूल के गिलास में भर गिलास भाँग की ठंडई ले लेने के बाद शुरू होता था। कोई-कोई पूछता, सुकुल जी, जब आप बाबा के बारे में इतना सब जानते हैं, तो अपने बच्चों के लिए बाबा से कुछ माँगा क्यों नहीं, रुपये का पेड़-सेड़? निःस्वार्थ बाबा का गुणगान करते रह गये, दूसरों के बच्चे कहाँ से कहाँ पहुँच गए।
गंज गोबरहवा की जिस मिट्टी को उदय सर अपने माथे से लगाने के लिए विकल रहते थे, उसी मिट्टी में उन्होंने जन्म लिया था, वहीं धरती जैसी सहनशील और अपने बच्चों को अतिशय प्रेम करने वाली माँ को जाना। माँ होना किसे कहते हैं, माँ के आँचल के नीचे छिपे अमृत की रसधार को जाना। माँ की गंध में जीवन की गंध को जाना। बुआ की गोद में छीछी करने और मीठी डाँट का सुख जाना। उसी मिट्टी में लोटा, उसी में खेला, उसी में बुआ से हिंदी का ककहरा सीखा। जिस मिट्टी में ज़िंदगी मिली, भाषा मिली। सुख को पहचाना, दुख को जाना। उम्मीद करना और आगे बढ़ना सीखा, उसी मिट्टी ने उन्हें मज़बूत बनाया। आज भी ज़रा-सा विकल होने पर उस मिट्टी को छूकर माथे से लगाना चाहते हैं। उदय सर अपने जीवन में इस मिट्टी की व्याप्ति को भला क्यों नहीं जानते!
गंज गोबरहवा की मिट्टी का जस दूर-दूर तक फैलने की पहली वजह निश्चय ही तीक्ष्णकंटक बाबा का मठ था, है और रहेगा। दूसरी वजह गंज गोबरहवा का रेलवे-स्टेशन है। ठीक-ठीक मालूम नहीं कि अँग्रेज़ पहले आए या तीक्ष्णकंटक बाबा, लेकिन यह बात अभिलेखों से प्रमाणित है कि गंज गोबरहवा रेलवे-स्टेशन, तीक्ष्णकंटक आश्रम बनने के बाद बना। पंडित शीतल प्रसाद सुकुल तो बताते कि तीक्ष्णकंटक बाबा ने अँग्रेज़ कलेक्टर बहादुर को डाँटा, उसके बाद आनन-फानन में बना था। पंडित शीतल प्रसाद सुकुल बताते कि उनके पिता पंडित जवाला प्रसाद सुकुल की आँखों देखी बात है कि स्टेशन मास्टर बाबा से पूछकर ही सिग्नल डाउन करते थे या गाड़ियों के आने-जाने पर लाल-हरी झंडी दिखाते थे। पंडित शीतल प्रसाद सुकुल बताते थे कि दो सौ साल बाद जब तीक्ष्णकंटक बाबा के अंतर्धान होने का समय आया तो उन्होंने सबसे पहले अपने प्रिय शिष्य और उत्तराधिकारी चिन्मयानंद को अपने पास बुलाया और शेष सभी शिष्यों की उपस्थिति में प्रधानशिष्य चिन्मयानंद के कान में कुछ बुदबुदाते और फूँकते हुए अपनी अध्यात्मिक शक्तियों को उनके भीतर प्रवेश कराकर, घोषणा की, कि मेरे अंतर्धान होने का समय आ गया है, आज से मठ का दायित्व और मेरा उत्तराधिकार चिन्मयानंद सँभालेंगे और जगत में मेरे द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक शक्तियों के स्वामी होने के नाते स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज के नाम से विख्यात होंगे तथा पूजे जाएँगे। तत्क्षण स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज के गुरु श्री महागुरु तीक्ष्णकंटक बाबा वहीं मठ के प्रांगण में हज़ारों भक्तों के सामने अंतर्धान हो गए। सबके लिए बाबा उसी क्षण अदृश्य हो गए, लेकिन स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज अपने गुरु को उन्हीं से प्राप्त दिव्यदृष्टि से ऊपर और ऊपर जाते हुए देखते रहे। अभी स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज और आगे तक देख सकते थे, गुरुदेव ने मार्ग के अधबीच से ही स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज को आदेशित किया कि जाओ बच्चा मठ और जगत का कार्य देखो।
भक्तों के लिए तीक्ष्णकंटक बाबा की तरह चिन्मयानंद बाबा भी जगत के लिए उतने ही पूज्य, आराध्य और एक फूँक से सभी प्रकार के कष्टों और संकट से मुक्ति दिलाने वाले आध्यात्मिक और जादुई शक्तियों के स्वामी थे। जगत में स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज, तीक्ष्णकंटक बाबा की भाँति श्रद्धा के सर्वोच्च आसन पर विराजमान थे। तीक्ष्णकंटक बाबा द्वारा प्रदत्त सभी व्यावहारिक शक्तियाँ भी उनके पास थीं। रेल-विभाग अभी भी उनसे पूछकर सारे कार्य करता था। गंज गोबरहवा रेलमार्ग पर विद्युतीकरण का कार्य उनसे पूछकर कराया गया। जब सिग्नल गिराने-उठाने का ज़माना ख़त्म हो गया और पूरी तरह सिस्टम का विद्युतीकरण हो गया, तब भी स्टेशन-मास्टर सिग्नल की बत्ती स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज से पूछकर ही लाल-पीली कराते थे। बाबा कहीं बाहर होते थे तो मठ के प्रबंधक से निर्देश लेते थे। बताने वाले तो बताते हैं कि आज तक यह परंपरा है कि बाबा के भक्त इस अंचल में कहीं भी ट्रेन में बिना टिकट सफ़र कर सकते हैं।
हमारे मित्र और रेलवे के अधिकारी रहे बीबी सिंह, पहले तीक्ष्णकंटक महाराज और बाद में चिन्मयानंद जी महाराज उर्फ़ छोटे महाराज उर्फ़ चिन्मय महाराज के परम भक्त हुए और हैं। तीक्ष्णकंटक महाराज ने उन्हें एक बड़े संकट से निकाला था। बीबी सिंह को अपने नाम को बिगाड़कर स्त्रीलिंग में कर दिए जाने से भारी समस्या थी, उनका नाम वंशबहादुर था और है, लेकिन उनके पट्टीदारों ने उनके नाम का सत्यानाश कर दिया था और है, एक तो उनके नाम का अँग्रेज़ी में संक्षिप्त रूप बीबी सिंह होता था और होता है, लेकिन बीबी को बीबी करके पुल्लिंग को काटकर स्त्रीलिंग कर दिया था, उसके बाद उन्हें सिंह से सिंग में बदल दिया गया था। कुछ तो ग़ुस्से में उन्हें सिंह की जगह सिंग भी नहीं कहते, बहुत ग़ुस्से में होने पर सीधे बीबी सींग कहते थे। इतना ही नहीं कुछ तो उन्हें सिंह और सिंग नहीं, सीधे बीबी सिंह कहते थे, यह सब बीबी सिंह के लिए बहुत मर्मांतक था, उन्होंने सीधे तीक्ष्णकंटक महाराज से नाम ठीक करा देने के लिए कहा। तीक्ष्णकंटक महाराज ने बीबी सिंह को अपने पास बैठाया, लाल टाई को खींचकर थोड़़ा और पास किया और सिर पर सुगंधित धृतकुमारी केश तेल लगे बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा कि बच्चा बीबी दास, प्रेम से कोई किसी को कुछ भी कहे, तो उसमें सिर्फ़ प्रेम देखना चाहिए। तीक्ष्णकंटक महाराज जी, जिन्हें बाद में बड़े महाराज जी कहा गया, ने इस प्रकार बीबी सिंग के जीवन से सींग को निकालकर दास बना दिया और उनके श्रीमुख से निकली वाणी लोक में तुरत आकाशवाणी की तरह फैल गई। बीबी सिंग, बीबी दास के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे और आज भी प्रसिद्ध हैं। बीबी दास को हम लोग, मेरा मतलब मैं और उदय और झंकार थोड़ा और सुधार कर बीदास कहने लगे थे, लेकिन लोक तो लकीर का फकीर था, बड़े महाराज ने बीबी दास कह दिया, तो कह दिया। बहरहाल बीदास के मुख से हमेशा बाबा की बड़ाई ही निकलती है। बीदास बताते हैं कि शुरू से ही, जब से यहाँ रेल-लाइन बिछी और रेल-इंजन डिब्बे समेत दौड़ा, बाबा के भक्तों को चेन पुलिंग करके ठीक अपने गाँव के सामने ट्रेन रोक कर उतरने और परिजनों को चढ़ाने की विशेष सुविधा दे दी गई। अस्ल में रेलवे-बोर्ड का अध्यक्ष भी मठ का भक्त था। रेलमंत्री तक मठ में पहले की तरह नए बाबा स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज से आशीर्वाद लेने आते थे। मठ गोबरहवा जंक्शन के नज़दीक ही था। बीदास सबको बताते थे, बाबा नाराज़ होकर फूँक मार दें, तो सवारी गाड़ी और मालगाड़ी के डिब्बे रेल की पटरियों पर उड़ने लगते थे। अव्वल तो बाबा को नाराज़ करने की हिम्मत न पहले के प्रधानमंत्री में थी, न आज के प्रधानमंत्री में है। बाबा उनकी सरकार, उनकी पार्टी और ख़ुद उनका राजनीतिक भविष्य, अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से ही नहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश के पंद्रह लोकसभा सीटों की जनता पर राजनीतिक प्रभाव के कारण भी अंधकारमय कर सकते थे और कर सकते हैं। बीदास कहते हैं कि अध्यात्म में राजनीति के मिश्रण से परमाणु बम से भी अधिक विस्फोटक और विनाशकारी शक्ति पैदा होती है, लेकिन हमारे बाबा ने उससे विनाश की नहीं, विकास की गंगा बहाई है। बाबा के पास इतनी विलक्षण शक्तियाँ हैं तो बेचारा स्टेशन मास्टर तो मामूली कारकुन है। जो कुछ करता है, मठ से पूछकर करता है।
गंज गोबरहवा स्टेशन के पास हरियाली पहले भी बहुत थी अब भी बहुत है। पंडित शीतल प्रसाद सुकुल बताते थे कि बड़े महाराज जी के समय में जंक्शन से लगायत बाबा के आश्रम तक साखू, शीशम और सागौन के बड़े-बड़े पेड़ बहुत थे। सब इतने घने थे और वनस्पतियों का जाल इतना फैला हुआ था कि यह पूरे जंगल का सबसे घना इलाक़ा था। मैंने देखा तो नहीं, लेकिन बताने वाले बताते हैं कि बाबा के पालतू शेर उसी में विश्राम करते थे। हालाँकि बाद में बीदास इस किंवदंती में संशोधन करते हैं, उनके मतानुसार बड़े महाराज जी के कुछ युवा भक्त, बाबा की महिमा को समाज में बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए ऐसा कहते थे, और कभी-कभी वे युवा स्वयं व्याघ्रचर्म ओढ़कर जंगल में उछल-कूद और न जाने क्या-क्या उल्टा-पुल्टा करते रहते थे। मठ के आज के युवा भक्त दमदार मोटरसाइकिलों पर मठ का ध्वज लगाकर पूर्वांचल में मठ के प्रभाव का प्रर्दशन और प्रचार करते हैं। हालाँकि नए महाराज स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज को जींस-टीशर्ट धारी मोटरसाइकिल सवार इन शेरों से जितना प्रेम है, उससे हज़ार गुना अधिक सच्चा प्रेम मठ की चालीस हज़ार गौमाताओं से है। बीदास इस बात से भी इनकार करते हैं कि मठ में कभी चालीस हज़ार गौमाताएँ थीं या आज हैं। उनका कहना है कि इस ज़माने में एक ही माता का ख़याल रखना भारी है, तमाम लोग अपने माँ-बाप को बुढ़ापे में अकेले मरने के लिए छोड़ देते है, भला कोई चालीस हज़ार माताओं की कैसे देख-भाल कर सकता है। चूँकि बीदास मेरे और उदय और झंकार, तीनों के दोस्त हैं, इसलिए हम आपस में दोस्ताना ढंग से भी चीज़ों पर बातचीत करके मामला सुलटा लेते थे और हैं। मैंने ही बीदास से कहा कि भाई चालीस हज़ार न सही, लेकिन चार सौ तो रही ही होंगी, शायद आज भी होंगी और फिर दिव्य शक्तियाँ भी मठ के बाबा जी लोगों के पास रही हैं। बीदास हँसे, बोले-देखिए मित्रवर संटी सुकुल जी, अभी पिछले दिनों ही मैं मठ की गौशाला की तरफ़ गया था, मैंने ख़ुद अपनी आँखों से देख और उँगलियों से छूकर गिना है, कुल सैंतीस गौमाताएँ हैं। मैंने फिर कहा, यार गिनने में भी भूल-चूक हो समती हैं। फिर हँसे बीदास, बोले-चलिए चालीस पर समझौता पक्का। इस तरह मठ की गौमाताओं की संख्या चालीस निर्धारित की गई। यहाँ हम अपने सभी तरह के पाठकों को बता देना ज़रूरी समझते हैं कि हम मठ के बाबाओं की दिव्यशक्तियों की संख्या नहीं तय कर रहे थे। हम लोग बहुत साधारण लोग हैं। हम एक-एक माताओं वाले लोग हैं। एक-एक माता की सेवा कर लें, इतना ही बहुत हैं। हम तो गंज गोबरहवा के साधारण परिवारों से निकले लोग हैं। हमारे पास न कोई मठ है, न कोई दिव्यशक्ति, जो है यहाँ की मिट्टी है, मिट्टी की शक्ति है। माँ ने जीवन दिया है, जीवन-रस से सींचा है और इस मिट्टी ने अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया है, तोतली ज़ुबान को भाषा का नैसर्गिक उपहार दिया है।
इसी मिट्टी में विद्यार्थियों के प्यारे उदय सर और मेरे यार उदय का कोई सत्तर साल पहले पंडित शीतल प्रसाद के धर में जन्म हुआ था। तब गंज गोबरहवा एक छोटी-सी ग्रामसभा थी। मेरा जन्म भी उसी के ज़रा-सा आगे-पीछे हुआ था, लेकिन मुझे छोड़िए कथा-नायक पर फोकस कीजिए। आपका नायक और मेरा उदय जितना माँ का लाडला था, उससे ज़्यादा बुआ का। बुआ उदय के नाते मुझे भी बहुत प्यार करती थीं। बुआ थीं बहुत अच्छी। माँ की गोद में उदय दूध पीने जाते थे और बुआ की गोद में जानबूझकर सू-सू करने से लेकर प्यार पाने, झूला झूलने और खुली हवा में आसमान के नीचे बाहर की दुनिया से रिश्ता जोड़ने के लिए। माँ उसके जीवन का कमरा थी, सुख की सेज थी, रसोई थी, दूध थी, दही थी, राबड़ी थी, दो पैसे की नारंगी आइसक्रीम थी, तो बुआ उसके जीवन की खिड़की थी, आसमान थी, खेत-खलिहान थी, दुनिया-जहान थी, खाने में उसे जो-जो चीज़ें प्रिय थीं, उसका खजाना थी, उसे सुख की नींद ख़ूब ठंडी से ठंडी रातों में बुआ के बिस्तर पर उसके साथ चिपक कर, उसके कलेजे से लगकर ही आती थी। जहाँ तक मुझे याद है, इसी मिट्टी में ग्यारह जनवरी की सबसे ठंडी और सबसे अँधेरी रात में उदय का जन्म हुआ था। शायद इसीलिए उदय के जीवन में लंबी-लंबी रातों और अँधेरों ने अपना घर बना लिया है। यह अलग बात है कि अपने माँ का लाड़ला ‘उदै’ और अपनी बुआ की जान ‘उद्दी’ ने मुश्किल से मुश्किल वक़्त में भी कभी हार नहीं मानी। चला, गिरा, उठा, फिर चला, लड़ा और ख़ूब लड़ा। देखते-देखते हिंदी का मज़बूत सिपाही बन गया। हिन्दी जो उसके लिए माँ भी थी, बुआ थी, है और अंतिम साँस तक रहेगी।
हिंदी के लिए जान की बाज़ी लगाने वाले उदय को हिंदी की दुनिया ने दिया भी तो क्या, दुख और उदासी का उपहार। हिंदी की दुनिया में उसके सच्चे सेवकों को काँटें ही काँटें मिलते है। इन काँटों को निकालने की विद्या पूर्वांचल के सबसे बड़े बाबा काँटा बाबा के पास भी नहीं थी और छोटे महाराज जी के पास भी नहीं है। उदय को हिंदी की दुनिया में अब कोई फूटी आँख से भी देखना नहीं पसंद करता है। उदय के उदय पर हिंदी की दुनिया में अब ख़ुशियाँ नहीं मनाई जाती हैं। कोई उदय सर को जन्मदिन पर अब फ़ोन नहीं करता है। साहित्य की मुख्यधारा से विद्रोह करने वाले लेखकों का कोई जन्मदिन-फन्मदिन नहीं होता है। अपने समय में ही उन्हें भुला दिया जाता है। सच तो यह कि वे अपने समय के अँधेरे और एकांत में अपने जन्म का शोक मना रहे होते हैं। अपने समय की साहित्य सत्ताओं से विद्रोह करने वाले लेखकों का भला कैसा जन्मदिन! अपने समय में याद न किए जाने के लिए ही तो वे होते हैं। हिंदी के बड़े-बड़े प्रकाशकों, आलोचकों और संपादकों के पास कविता की कितनी कच्ची समझ है, यह इस बात से भी समझ सकते हैं कि उन्हें यह पता ही नहीं है कि कविता में कुलीन कोख से पैदा होने के अलावा, सीधे आसमान से फाट पड़ने का भी रास्ता होता है। कवि सिर्फ़ सुकुमार, अतिव्यावहारिक, अतिविनम्र और नित्य नतशीश ही नहीं होते हैं; बल्कि कुछ कवियों को सींग निकल आती है, पूरे शरीर में काँटे ही काँटे उग आते हैं और उनकी कविताएँ बहुत कोमल और बहुत शाकाहारी नहीं, बहुत खुरदरी और काँटेदार होती हैं; उनमें विस्फोटक भरा होता है। उदय को पता है कि उदय जैसे लेखकों के हिस्से में साहित्य के दिन का उजाला नहीं, ख़ूब अँधेरी रातें और अँधेरे की लंबी-लंबी सुरंग होती हैं। उदय सर छड़ी की मूठ को कसके पकड़कर उसकी नोंक से सुरंग के भीतर अँधेरे की दीवार को ठक-ठक ठोकते हुए बड़बड़ाते हैं :
“छोटी, मेरी बेटी मुझे माफ़ कर दो, मैं तुम लोगों के लिए कुछ ख़ास नहीं कर पाया। उजाले का पहाड़ तो ख़ैर क्या ला पाता, एक टुकड़ा भी तो नहीं ला सका, रंग-बिरंगी रोशनी का छोटा-सा आसमान नहीं ला सका कभी, उजाले की बड़ी-बड़ी नदियाँ ख़ैर क्या ला पाता, कोई छोटी पहाड़ी नदी, कोई जमुआर नाला, पहाड़ से उतारकर नहीं ला सका। जितना मैं अपने बच्चों के लिए कर सकता था, उसका सौवाँ हिस्सा भी नहीं कर पाया। कभी तुम लोगों को गोद में लेकर पहली कक्षा की किताब तक तो निश्चिंततापूर्वक पढ़ा नहीं पाया। उस वक़्त भी हिंदी का कोई न कोई राक्षस मेरे दिमाग़ में घुसा होता था। घर में भी उससे मेरे दिमाग़ में लड़ाई होती रहती थी। हिंदी विभाग की नौकरी शुरू से मेरे गले की फाँस थी बेटा। जी का जंजाल थी। अब जब कि मेरा अँधेरे की इस सुरंग से निकलना नामुमकिन है, मैं हाथ जोड़कर अपने बच्चों से कहना चाहता हूँ, मुझे माफ़ कर देना, मेरे बच्चो! तुम्हारा पिता शुरू से ही हिंदी के दुश्मनों से घिर गया था। मैं नहीं चाहता था, फिर भी मेरे मुश्किल जीवन की अवांछित छाया हमेशा तुम सबके जीवन पर रही। यह जीवन मैंने ख़ुद नहीं चुना था, मेरे बच्चो! मैं भी एक साधारण पिता, एक साधारण पति और हिंदी के एक साधारण कार्यकर्ता की तरह रहना चाहता था, लेकिन ये तो मेरे गुरु थे, जिन्होंने हिंदी के भेड़ियों के बीच नोच-नोचकर खा जाने के लिए अँधेरे की कँटीली झाड़ियों में मुझे फेंक दिया था। फिर भी मैं शायद अपने बच्चों के लिए बच गया। ऐसा कँटीला पथ भला कोई लेखक ख़ुशी-ख़ुशी चुनता है, कौन अपने घर-परिवार और बच्चों के भविष्य को दाँव पर लगाता है? सच तो यह कि निराला से पद उधार लेकर कहूँ तो ऐसा हिंदी का जीवन और कँटीला पथ मेरे लिए मेरे गुरुओं का स्नेहोपहार है। यह अँधेरे की सुरंग और इससे निकलने की जद्दोजहद शायद कभी ख़त्म नहीं होगी। मुझे माफ़ कर देना मेरे बच्चो!”
उदय सर फूट-फूटकर रो रहे हैं, पहले भी ऐसे ही कभी बच्चों के बारे में सोच-सोचकर अपने एकांत में या मेरे कंधे पर सिर रखकर रोते थे, शायद आगे भी इसी तरह रोते रहेंगे और बुदबुदाते रहेंगे कि ये आँसू नहीं हिंदी की अनुपम भेंट हैं।
जमुआर नाले पर बना लोहे का पुल करिश्माई था, उदय के पास चाहे जितनी निराशा हो, चाहे जितना दुख हो, चाहे जितना मुरझाया हो उसका मुख, चाहे जितनी डबडब हो आँखें, चाहे जितने उलझे हों सिर के बाल, चाहे जितना तेज़ धड़कता हो उसका दिल... सब एक स्पर्श से सँभाल लेता था। उसके किनारे बनी दो-तीन जन के बैठने भर की जगह पर बैठते ही उदय के भीतर किसी विद्युत-तरंग का अनुभव होता था। कोई जादू हो जाता था। जमुआर उसके लिए जीवन-रेखा भी है और स्मृति-रेखा भी, औरों के लिए उसमें पानी बहता था, उदय के लिए उसका जीवन और उससे जुड़ी तमाम यादें बहती थीं। वह अब भी इस पुल से गुज़रता है, लेकिन बैठने का सुयोग कम बनता है। जबकि बैठने के लिए अब काफ़ी जगह हो गई है। लोहे के पुराने पुल की जगह फ़ोरलेन का आधुनिक पुल बन गया है। बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ ख़ूब फर्राटा भरती हैं। मनुष्यों और वस्तुओं की आवाजाही का प्रशस्त मार्ग बन गया है। दो-लेन का एक पतला-सा रास्ता, अब अपनी चौड़ाई और आधुनिक तकनीक से बनी नए तरह की सड़क की वजह से एहसास कराता है कि चिन्मय बाबा की कृपा में भी तीक्ष्णकंटक बाबा की तरह जादू है। लोक में मठ के प्रति इतनी गहरी आस्था है कि अधिकांश भक्त चिन्मय बाबा को भी तीक्ष्णकंटक बाबा या तीक्ष्णकंटक महाराज या काँटा बाबा के नाम से ही जानते और पुकारते हैं। चिन्मय महाराज ने भी बड़े महाराज की तरह अपने क्षेत्र और पूरे पूर्वांचल में बहुत काम कराया है। सच तो यह कि छोटे महाराज ने मठ की राजनीतिक शक्तियों को आसमान पर पहुँचा दिया है। पूरे पूर्वांचल में विकास की ऐसी गंगा इससे पहले नहीं बही थी। गंज गोबरहवा, प्रदेश की राजधानी तो नहीं है, लेकिन राजधानी से कम भी नहीं है। उदय सर छोटे महाराज जी के बनवाए पुल पर कभी रुककर घड़ी दो घड़ी के लिए बैठते हैं, तो सबसे पहले नानी की यादें छाप लेती हैं, लोहे का पुल याद आता है। बहता हुआ समय याद आता है। जामुन का स्वाद उसकी जिह्वा और दाँतों और गले से होता हुआ उसकी आत्मा तक पहुँच जाता है, जहाँ उसकी नानी का घर आज भी जस का तस है, जमुआर की बाढ़ ने उसे कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया है। जमुआर की तमाम खट्टी-मीठी यादें हैं, कुछ तो बहुत डरावनी भी। बाढ़ के दिनों में जमुआर नाला, जिस नदी से निकलकर बहता है, उसी बाणगंगा नदी का विशाल रूप धर लेता है, लगता ही नहीं कि यह कोई उपनदी है। असगाँव-पसगाँव सब समुद्र के बीच कोई टापू बन जाते है। कहने को सबका रखवाला था जमुआर नाला। अल्हड़ पहाड़ी नदी से निकलकर दूसरी नदी में घुस जाने वाला, आधा मामूली और आधा ग़ैरमामूली, आधा शरीफ़ और आधा बदमाश नाला था। अक्सर नानी, जमुआर के एक से एक क़िस्से सुनाती थी। जब-जब बरसता था पहाड़ पर पानी ख़ूब, रह-रहकर घबराती थी नानी ख़ूब, अब फूलेगा जमुआर का पेट, अब फटेगा जमुआर का पेट, फैल जाएगा दूर-दूर तक जमुआर का पानी, अड़ोस-पड़ोस, क़स्बा, गाँव-गिराँव, हज़ार-हज़ार घरों में घुस जाएगा इसका पानी, ठीक-ठीक समझ नहीं पाती थी नानी, यह पहाड़ पर बरसने वाला पानी है या जमुआर नाले के राक्षस का उत्पात, किस-किसकी लेगा जान, ढहाएगा किस-किसका घर, उठा ले जाएगा किस-किसका ढोर-डंगर, जानना चाहती थी नानी यह बात...
और जब जमुआर का पानी छूमंतर हो जाता है, तो पता ही नहीं चलता कि कहाँ चला जाता है इसका पानी। जब आस-पास के खेत एक-एक बूँद पानी के लिए तरसते हैं, इसकी विशाल जलराशि पलक झपकते भाप बनकर उड़ जाती है या शायद कोई अदृश्य छेद है जमुआर नाला के दिल में, जहाँ से कहीं और चला जाता है इसका सारा पानी, सन्न से। कोई राक्षस है भीमकाय अदेख इसके भीतर किसी सुरंग में छिपा हुआ, हज़ार-हज़ार जन्मों का प्यासा, एक साँस में पी जाता है सारा डबडब पानी, एक-एक बूँद। कड़ाके का जाड़ा पड़ता था। नानी रजाई के भीतर अपने सीने से चिपकाकर आधा नींद में और आधा जागते जाड़े की काली-काली और लंबी सुनसान रातों में जमुआर नाले के क़िस्से सुनाती थी। कभी जमुआर के राक्षस के, कभी समय के किसी प्रेत के, चुड़ैल के, कभी किसी टोनहिन के बान के, तो किसी धोकरकस के जाल के, कभी ठंड के, तूफ़ान के, कभी प्रचंड ताप के, औचक अकाल के, तो कभी काल के, हज़ार क़िस्से। अपनी रजाई में कभी, आँचल के नीचे कभी, कभी पलकों के भीतर तो कभी अंतस्तल में दिन-रात अपने नवासों को लोहे के संदूक़ में अपनी प्यारी-प्यारी रंगीन छपेली साड़ियों की तरह बड़े जतन से छुपाए रखनेवाली मेरी अच्छी नानी, ओ मेरी नानी! उदय का मन आज भी उसे दिन-रात ढूँढ़ता रहता है। कहाँ हो क़िस्से वाली नानी, जहाँ हो लौट आओ। तम्बाकूवाले पान की शौक़ीन थी नानी, पान में बसी रहती थी नानी की जान, कहती थी सीखा था नाना की सोहबत में, क्या पता मुहब्बत में! उसी प्यारी-प्यारी नानी की प्यारी-प्यारी उँगलियों को पकड़कर सीखा था पार करना यह जमुआर नाला जिसे अक्सर नानी कहती थी आफत का परकाला। सचमुच आफत के मारे होते थे पास-पड़ोस के तमाम निर्धन खेत, एकटक ताकते हुए बस खड़े रहते थे हरदम हाथ जोड़े। जब-जब सूखता था असमय धान की नस-नस में बचा-खुचा पानी। याद आती थी बहुत नानी। ख़ाली घड़े की तरह औंधे मुँह पड़ा रहता था बेशर्म जमुआर। ख़ूब ग़ुस्साती थी नानी। छड़ी उठाती थी। ख़ूब खरा-खोटा सुनाती थी। यों तो कमबख़्त देखने में ग़ज़ब का भोला-भाला था। क्या ये लंबे-लंबे प्यारे-प्यारे खट-मिट्ठे जामुन के दरख़्त और क्या झुंड के झुंड कँटीले बबूल, क्या बिना दाढ़ी-मूँछ के ये बड़े-बड़े लड़के और क्या बित्ता-बित्ता भर की बकरियाँ, जिनके संग घास जुटाती ये लंबी-लंबी लड़कियाँ हँसतीं-बोलतीं। जमुआर के मन के चोर को सबको बताना चाहती थी नानी। ओह यादें तो थमती ही नहीं। नहीं रहा लोहे का पुल, नहीं रही नानी, कब को चली गई नानी, बहुत कुछ अनकहा छोड़कर, वापस अपनी कहानी की परियों के देश में। लोहे के जिस पुल पर नानी की हथेलियों की छाप थी, नहीं रहा वह पुराना पुल। यह कोई और पुल बन गया है। लंबा-सा कोई बहुत आधुनिक, आधुनिक से भी आगे, जो उदय को नहीं पहचानता, उसकी नानी को नहीं जानता। पुराने पुल के पास के जामुन, बबूल और दूसरे दरख़्तों को काटकर यह नया पुल बना है। यह पुल उदय की नानी का पुल नहीं है। शायद यह कोई और जमुआर नाला है। जमुआर है कि समय कि जीवन जो बह रहा है धीरे-धीरे, जो कह रहा है धीरे-धीरे कुछ उदय के भीतर। यह क्या है उदय के भीतर। ये कहाँ से आकर बस गई हैं जामुन के लंबे-लंबे दरख़्तों की परछाइयाँ, उदय की जीभ और दाँतों को किसने रँग दिया है जामुन के रंग से। यह कैसी हवा चल रही है... फड़फड़ा रहे हैं उदय की आत्मा के पन्ने, जिन पर दर्ज है जामुन के स्वाद की कैफ़ियत और नानी के हज़ार क़िस्से। ये उदय की आँखों को क्या हो गया है! अचानक बह रही हैं जमुआर नाले की तरह अबाध, कहाँ से आ गया है इतना सारा पानी! उदय के आँसू रुक ही नहीं रहे हैं। बुदबुदा रहा है, लौट आओ नानी, लौट आओ! जमुआर नाले के राक्षसों ने हिंदी के राक्षसों का भेस धर लिया है। मैं चारों तरफ़ से घिर गया हूँ नानी
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