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क्लचर : बालों से निकलकर

वैशाख की इस अलस-दुपहरी में जहाँ मैं नहीं हूँ; सोचता हूँ, दाँवरि के बाद वहाँ अलसाने के दिन आ गए होंगे। परदेशियों की याद में ग्राम्यवधुएँ छत पर लत्ते-सी सूख रही होंगी और जम्हाई लेते हुए रसिक मनफेरवट से दुपहरें गुज़ार रहे होंगे।

पिछले शुक्रवार की दुपहरी में दैनिक असंगति ही मुझे वहाँ ले आई थी। एक नितांत खलिहर कार्यालयी ऊब, दर्द और निराशा के बावजूद मैं वहाँ उपस्थित था। ग्राम्यवधुओं की सकुचाहट लिए, घूँघट डाले स्त्रियाँ अचके धूप से ख़ुद को बचाती हुईं, बग़लें झाँक रही थीं। सफ़ेद कोट पहनने वाली लड़कियाँ धूप को दाँव दे रही थीं। दिन भर हँकर-हँकर चलते ई-रिक्शे, सड़क की चौहद्दी नाप लेने भर को आतुर थे। शहर की दुपहरों की-सी परिचित व्यस्तता का वही समूचा संलाप मेरे इर्द-गिर्द मौजूद था।

महानगरीय अभिजात के बीच पसरी नीरवता में चिढ़ और निरर्थकता में मैं त्रस्त हो रहा था। एक चुरूआ पानी की ज़रूरत, मुझे बचपन की स्कूली-दुपहरों में ले गई। अभी छिड़े हुए समय के गवाक्ष से मैं सुदूर काल में पारेषित हो उठा।

वह एक अहातानुमा जगह थी, जिसकी चहारदीवारी सब्ज़ पत्तों और कुछ फूलों से दृष्ट हो रही थी। गेट के भीतर हुए बग़ैर, उस पार के दृश्य न दीख सकते थे। इमारत की प्राचीनता और इस उत्सवधर्मी महानगर में उसका संकुचित एकालाप, मुझे आकर्षित कर उठा। इस दृश्य में संभवतः यह मेरा दूसरा दाख़िला था।

मुझे ज़रूरत एक पत्र-छाँव की आन पड़ी। धूप और आवाजाही के अतिरेक से बचाव में मैं एक ऐसी जगह ढूँढ़ने लगा था, जो दृश्यातीत हो। एक अदीठे बेंच की ओर मेरी नज़र गई, जो कुछ लताओं और पेड़ों की झुकी डालियों के बीच में था—मानव-साहचर्य से एक दूरी पर, लता-गुल्मों के घेरे में। मैं उस बेंच की ओर सरक गया। वहाँ; जहाँ बैठने की जगह थी, बालों से निकलकर एक क्लचर छूट गया था। उसके साहचर्य में दो पत्ते भी उसके पास थे। यह कैसा संयोग हुआ? एक छूटा क्लचर, दो थिरे हुए सहचर पत्ते—यह दृश्य कैसे अर्थोपम होगा। उस दृश्य में एक प्रतीक्षा थी, सुंदर होने की लय में व्यतीत को परिभाषित करता हुआ।

मैं व्यतीत के बारे में सोचने लगा। अभी कुछ देर पहले ही यह क्लचर किसी सुकेशिनी के केशों के गुम्फन में रहा होगा और अब मुक्त, अर्थहीन हो उदास पड़ा है। संभव हो कोई कामकाजी रमणी अपने बालों से क्लचर निकालकर, यहाँ रख भूल गई हो। भूल जाना सहज ही है। अबोधपने के तमाम प्रसंगों में भूली हुई, ऐसी बहुत-सी चीज़ों की याद रह गई है। खेत की मेंड़ पर भूले हुए एक जोड़े चप्पल की याद, किराए के कमरे की चाबी की भूलने की याद। ऐसी तमाम यादें है, जो भूली हुई चीज़ों तक बारहा लौटाती रही हैं। लेकिन यह क्लचर भूलना भी क्या वैसा ही सहज होगा?

मैंने महसूस किया; इस गर्मी की साँझ सुंदर होगी यक़ीनन, लेकिन वह सुकेशनी बालों का क्लचर क्यों छोड़ गई? छोड़ जाने की प्रायिक्ताएँ मुझे उन व्यतीत दृश्यों में ले गई, जिसके बारे में अभी मैं सोच रहा था।

शाकुंतल के पन्नों से नहीं, ओला-उबर-रैपिडो से नहीं, मेट्रो से चलकर आई किसी शकुंतला के बारे में सहसा मैं सोचने लगा। क्या यह भूल सायास हुई होगी? जीवन-व्यापार के प्रसंगों में उलझी, कामकाजी शकुंतला सचमुच इसे भूल गई होगी या अभिज्ञान के लिए यह पहचान-चिह्न छोड़कर चली गई। क्या शकुंतला ने इसे छोड़ने से पहले सोचा होगा कि स्नेह-चिह्न देने की रवायत में, अँगूठी देकर जाने का अधिकार केवल दुष्यंत को ही है क्या? शकुंतला भी तो यह कर सकती है। महाकवि ने लोकमत का औचित्य साधने की कोशिश में दुर्वासा का शाप आरोहित कर, क्या दुष्यंत के अपराध को कम कर दिया? क्लचर के छूट जाने या छोड़ दिए जाने के सायास-अनायास, तमाम कारण मुझे और-और सोचने के लिए उकसाने लगे।

बहुत संभव है कि शकुंतला इसी परिसर में काम करती होगी। इन्हीं पेड़ों, लताओं में उसका मन अटका रहता होगा। एप्रन पहने ओपीडी के लंबे इंतज़ार की दैनिकता से ऊबी-थकी शकुंतला, इन पत्र-पुष्प और लताओं को देखकर, पसीने में भीगी देह के साथ इन्हीं की छाया में सुस्ताती होगी। दुपहर में आकर इन्हीं से बोल-बतिया लेती होगी। बहुत ख़ुश होकर वह प्रमदा इस युगबोध से परे जाकर, शिरीष के फूलों के झुमके तलाश करती होगी। हो सकता है कि सचमुच इन पेड़ों से उसे प्रेम होगा और वह लू भरी इस दुपहर में भी, कमल की पंखुड़ियों से कठोर शमी का वृक्ष काटने-सा उपक्रम कर रही होगी। पसीने से लथपथ हो; उसके कानों में शिरीष-फूल के झुमके, उसके गालों से चिपक गए होंगे। प्रियंवदा ने उसे ज़रूर ही छेड़ा होगा, “इसमें तुम्हारे कपड़ों का क्या दोष! यौवन का आधिक्य तुम्हें सता रहा है।” और उस मुस्कराई प्रथमावतीर्ण यौवना ने, मन में कुलाँचे भर शिरीष की अनुपस्थिति में गुलाचीन के फूलों को कनखोसुआ बना लिया होगा। लेकिन आख़िर अपना क्लचर क्यों छोड़ दिया उसने?

यह भी तो हो सकता है कि किसी दुष्यंत के हठ से वह प्रियंवदा का साथ छोड़, यहाँ घड़ी भर बैठ गई होगी। उसके ढीले पड़ गए सुबह के बाँधे बाल खुल गए होंगे या उसने ख़ुद ही खोल दिए होंगे। दुष्यंत की उँगलियों ने उन सघन-घन-कुंचित केशों में अपनी लज्जा का समाधान ढूँढ़ लिया होगा। प्रेमातिरेक में अपने कुंतलों की स्वतंत्रता में वह ख़ुद की स्वतंत्रता महसूस कर रही होगी। उसे भान न हुआ होगा कि उसका क्लचर यहाँ बालों से निकलकर, कितना हतभाग्य महसूस कर रहा है।

बहुत संभव हो कि एक सुखद सहवास की याद में वह अधीर हो उठी हो और किसी गंध के अनुगमन में यहाँ, इसी छाया तक चली आई हो। प्रत्यागमन की आकांक्षा में उसने अपने केश को मुक्त कर, यह चिह्न रख दिया हो, “कि जब भी आना हो, आ सकते हो मेरे क्लचर से मुझ तक तुम।” और वह मुक्तकेशी उठकर चली गई होगी।

दुपहरी ढलकर तीजहर की ओर बढ़ने लगी थी। उठकर जाने की ओर बढ़ते हुए मैंने फिर से देखा और सोचा कि इतना सोचना शायद अतिरेक ही होगा। हो न हो, उसे जल्दी रही होगी। सहसा उसे स्मरण हुआ होगा कि शकुंतलाओं को समय पर लौटना होता है। वह मेट्रो की जल्दबाज़ी में निकल गई होगी। मैं कल्पना में ही था कि अचानक यथार्थ किसी सामंत के बरबट्ट कारिंदे की तरह मुझे रगेदते हुए निकल गया। कई मंज़िला इमारतों से घिरी उस जगह से ललछऊँ क्षितिज दीख न पड़ता था। लेकिन कामकाजी लोगों के थक-हारकर घर लौटने के क्रम में मैंने देखा, साँझ एकाएक झनझनाने को आतुर थी। इसी संझा में महाकवि का स्मरण हो आया और इसी स्मरण में मैंने पाया कि दिन मानो किसी झुरमुट के पीछे छिपते हुए, किसी विशालाक्षी की आँखों की कोर में बसीं रक्तिम-धारिकाओं में ख़ुद को समेट रहा हो। यह साँझ सृष्टि की दिनचर्या का उपसंहार ही तो है।

“पद्मकान्तिमरुणत्रिभागयोः सङ्क्रमय्य तव नेत्रयोरिव।
सङ्क्षये जगदिव प्रजेश्वरः संहरत्यहरसावहर्पतिः।।”

[कुमारसंभवम्, ८/३०]

काले बादलों से सघन हुई, उस साँझ में चार घंटे बाद महुआ चूने का आभास था। लगा कुसमय ही घनघोर वर्षा हो सकती है। अब भी उस क्लचर के बग़ल में दो पत्र पड़े थे—किसी अज्ञात विचार-वृक्ष का संदेश-रासक बने हुए।

मैंने सोचा अपना क्लचर छोड़कर जाने वाली शकुंतला इस समय क्या कर रही होगी? हवा अपनी लय में उसकी गुलियार आँखों को, उसके बालों से ढक रही होगी। भरी गर्मी में उसके बाल उसे परेशान कर रहे होंगे। मकान के ऊपरी तल्ले पर उसका कमरा भभका छोड़ रहा होगा। वह नर्म गद्दों पर जाकर औंधे मुँह गिर गई होगी। क्या उस आधारहीना के तंद्रालस नर्म आघातों का कोई प्रत्युत्तर होगा, या फिर दिन भर ओपीडी में एप्रन पहने, पसीने से तर-बतर हुई उसकी देह का नमक उसे और गला रहा होगा। संभव हो नेटफ़्लिक्स पर ‘लिटिल थिंग्स’ देखते हुए, इस रम्य साँझ में वह घूँट-घूँट बीयर की अभिलाषा में होगी, या सप्ताहांत की तर्ज़ पर वह जल्दी पहुँचकर सो गई होगी।

अब जबकि मैं यह लिख रहा हूँ, कई दिन बीत गए हैं। बसों की अहर्निश यात्रा, रेलगाड़ियों के कैंसिल होने, लेट होने और उनके इंतज़ार में झकोर के बहती पछुआ में मैं सूख रहा हूँ। वह जगह, जहाँ वह कल्चर छूट गया था, यहाँ से वहाँ में ज़माने भर की दूरियाँ हैं। बहुतेरे मुद्दे हैं। सोशल मीडिया और टेलीविज़न की बहसें हैं। एक शदीद इंतज़ार में पिघलती हुई रात है, जहाँ एक साइकिल सवार बीच रात में गली में खनखनाहट छोड़ गया। फिर भी, मेरे मन को यह तसल्ली कर लेने दो शिरीष-फूलों की चाह रखने वाली शकुंतला कि तुम अपना कल्चर जानबूझकर छोड़ आई हो।

तुम्हारी अशेष प्रतीक्षा, तुम्हारे लिए की गई उन दो पत्रों की प्रतीक्षा...

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