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बिंदुघाटी 2.0 : वोटिंग, विवेकाधिकार और आज़ादी का विचार

• अधिक बूढ़े लोग कहते हैं कि अँग्रेज़ ही अच्छे थे। यह बात वे देश-विरोध के चलते नहीं कहते। वे शासन-प्रशासन में बाबुओं से लेकर उच्चपदस्थों को देखकर ऐसा कहते हैं। दोग़लेपन में लिभड़ा हुआ वर्तमान अतीतप्रेम को जन्म देता है।

• तात्कालिकता जुगाड़ से जन्मती है। इतिहास तात्कालिकता को मार देता है, इसीलिए वह अधिक न्यायपूर्ण हो जाता है। लेकिन कभी-कभी इतिहास भी तात्कालिकता के आग़ोश में दम तोड़ने लगता है, विरूपित हो जाता है। एक और इतिहास ही इसे बचाता है, इसी तरह एक नैरंतर्य क़ायम होता है। इतिहास यों ही सबसे अधिक स्पंदनशील विषय नहीं है।

• आज़ादी का विचार, किसी भी कालखंड में आज़ादी की स्थिति से अधिक बड़ा है। यही कारण है कि आज़ादी को समय-समय पर परिभाषित किया गया है। महात्मा गांधी के लिए एक व्यक्ति की आज़ादी उसके व्यक्तित्व की समग्र अभिव्यक्ति की आज़ादी है। कितना बड़ा विचार है यह और कितना बुनियादी भी! व्यक्ति जब भी इसमें बाधा महसूस करता है, वह स्वयं को ग़ुलाम महसूस करता है। यह ग़ुलामी की पीड़ा जब बड़े समूह में पाई जाती है तो आंदोलन जन्म लेते हैं।

• पंद्रह अगस्त की तिथि हमारी अस्मिता में विरोधाभासी भावों के साथ संलग्न है। तीन सौ पैंसठ दिनों में यह एक तिथि जागरूक नागरिकता के लिए समीक्षा की तिथि है। 

• सार्त्र कहते हैं : “जैसा व्यवहार हम पाते हैं; उसके प्रति हम कैसा व्यवहार करते हैं, इसमें हमारी स्वतंत्रता निहित है।” यह बात खुलना माँगती है। अगर किसी व्यवस्था द्वारा हमारे जीवन को एक गाली में परिवर्तित कर दिया जाए तो क्या हम उस व्यवस्था को गाली भी नहीं दे सकते? अगर इतनी स्वतंत्रता भी हमें हासिल नहीं है तो इस स्वतंत्रता को पुनर्परिभाषित करने की ज़रूरत है।

• स्वतंत्रता दिवस के समय देश में आंदोलन हो रहे हैं। यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए शुभ स्थिति है। ये आंदोलन नागरिकों द्वारा अपनी शासन-व्यवस्था को उत्तरदायी बनाने के लिए हैं। आज़ादी के पहले हुए आंदोलन एक व्यवस्था को उखाड़ने के लिए थे। लेकिन उसी समय लोगों द्वारा लोगों को सुधारने के आंदोलन भी चल रहे थे। आज के आंदोलनों में ये सारे भाव निहित हैं, इनमें शासन-व्यवस्था को सुधारने के साथ ही दिग्भ्रमित और विभाजित नागरिकता को सुधारने का भाव भी होता है।

• नागरिकों को अपनी नागरिक अस्मिता को समझना होगा। उनकी तमाम अस्मिताएँ हो सकती हैं, लेकिन संविधान प्रदत्त नागरिक अस्मिता सबसे महत्त्वपूर्ण होनी चाहिए। इसमें दो बाते निहित हैं—एक नागरिक का दूसरे के साथ सामंजस्य और राज्य की नागरिकों के प्रति पूर्ण जवाबदेही... इन दो बातों के प्रति जागरूक नागरिक ही अपनी नागरिक अस्मिता को समझता है।

• जैसे मृत्यु शाश्वत है, वैसे ही उसका भय भी। स्वाभाविक दशा में मृत्यु का भय होना ही है। इस भय के मायने अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन यह रहता है। मृत्यु एक न बदली जा सकने वाली स्थिति है। जो चले गए उन्हें न हम दुबारा देख सकते हैं और न ही छू सकते हैं। जीवन हमेशा बदलता रहता है। यहाँ रूपांतर ही विकास है। लेकिन मृत्यु के बिल्कुल पहले की स्थिति का कोई विकास संभव नहीं है। उसका आख़िरी रूप ही हमेशा के लिए रह जाता है।

• बुरी ख़बरें ही ख़बर होती हैं, लेकिन किसी अपने संबंधी की मृत्यु महज़ एक ख़बर नहीं होती है। एक संवेदनशील हृदय के लिए तो कोई भी मृत्यु महज़ एक ख़बर नहीं होती है। किसी की भी मृत्यु अपनी क्षणिकता के आभास को तीव्र कर देती है। सत्रहवीं सदी के कवि जॉन डन इसे इस तरह कहते हैं : “मृत्यु किसी की भी हो; मुझे कम कर देती है, क्योंकि मैं इस मानवता में गहराई से संपृक्त हूँ।”

• शंकर शेष के एक नाटक में एक मृत पात्र कहता है : “चेहरे केवल ज़िंदा रहते बदले जा सकते हैं—एक-दो-दस-सौ... पर मृत्यु हमेशा चेहरा उतारकर रख देती है।”

किसी भी धत्-कर्म में लिप्त रहकर जीवित और प्रासंगिक बने रहने के उपक्रमों से प्रायः जीवन चलता रहता है। प्रायः सबका ही जीवन ऐसे ही चलता रहता है। लोगों के पास चेहरे ही चेहरे हैं, लेकिन मृत्यु का एक ही चेहरा होता है।

• हमारे चारों तरफ़ तरह-तरह के पैंतरे खेलते लोग भी मृत्यु से डरते हैं। वे स्वयं से, जीवन से या जिनमें जीवन है; उनसे खेल रहे हैं। यहाँ तक कि दूसरों की मौतों से भी लोग खेल रहे हैं। लेकिन स्वयं अपनी मौत किसी को यह अधिकार नहीं देती है। साहित्य में जीवितों का मूल्यांकन संभव नहीं है, उनके साथ बस खेल संभव है। समीक्षाजीवी साहित्यिक मर चुका है। अब भी जिन्होंने उसका मूल्यांकन नहीं किया; समझो वही उसे जीवित समझ रहा है, उसे वैसे ही व्यक्ति से बातचीत रखनी चाहिए।

• “अंतिम यात्रा को किसी और प्रतीक की ज़रूरत नहीं होती!”

‘तुग़लक़’ नाटक के दसवें दृश्य में आए इस वाक्य को थोड़ा छूट लेकर देखा जाए तो यह तरह-तरह से मानीख़ेज़ है। ये सारी छूटें मैं पाठकों के लिए सुरक्षित कर रहा हूँ, इस तरह के महान् वाक्यों का मैं भी सिर्फ़ एक रसग्राही पाठक ही रहना चाहता हूँ।

• विवेकाधिकार एक विवादास्पद शै है, जैसे कि पाठक का विवेकाधिकार। पाठक रसग्राही होता है और जब वह निर्णय देने की स्थिति में पहुँचता है तो वह सिर्फ़ पाठक नहीं होता है। तब वह अपने अहम्, इतिहासबोध, समकालीनता,राजनीति जैसे संप्रत्त्यों से जुड़ जाता है।

• ‘हिन्दवी’ के ‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’ के अंतिम दस चयनित कवियों-प्रतिभागियों के लिए पाठकों को वोटिंग का मिला हुआ विवेकाधिकार विरोधाभासों से रिक्त नहीं है। वैसे ही विरोधाभासी, जैसे इस प्रतियोगिता के लिए किसी निर्णायक-मंडल का विवेकाधिकार भी होता। कविता को लेकर हिंदी साहित्यिक समाज का विवेक कितना सम्यक् है कि यह इधर-उधर प्रकाशित होतीं कविताओं के लिए उस समय आ रही पाठकीय प्रतिक्रियाओं में ही दिख जाता है। दोस्तियाँ, मुँहदेखी, गणनाप्रेम, क़द-पद-ज़द-हद-अस्मिता जैसी बातें कविता की दिखने वाली पाठकीयता से जुड़ जाते हैं। पाठक-समाज की अपनी कोई अस्मिता नहीं बची है, वह अब महज़ एक प्रतिक्रियारत समाज है।

• प्रतिक्रियारत समाज एक यूफ़ोरिक समाज है, जो नाचता हुआ दीखता है : न कि कुछ पढ़कर प्रशांति या गहरे उद्वेलन में जाता हुआ। इसी यूफ़ोरिया को ध्यान में रखकर कवि-लेखक अपना काम करते भी हैं। ज़्यादातर लोग तो नाचते-नाचते एक दिन नचाने वाला बन जाते हैं। इसी तरह कमोबेश सोशल-मीडिया आधृत साहित्यिक उपक्रम नाच-नाचकर मस्त हैं। यह मस्ती और मस्ती चाहती है। यों साहित्य का संसार लिरिकल हो पड़ा है। नाचता हुआ पाठक, नाचता हुआ लेखक और लट्टू बल्बों की तरह जलता और पुट्ट होकर बुझता हुआ साहित्य!

• ‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’ नामक प्रतियोगिता के लिए मैं एक नहीं; एक साथ दस हाथ उठाना चाहता हूँ, लेकिन मेरा हाथ मेरी जेब से निकलता ही नहीं। मैं कैसे अपने पाठकीय विवेक का इस्तेमाल करूँ! इसको तो बनाने का न मुझे कभी समय मिला और न ही कोई तात्कालिक उपक्रम। मेरी तो चेतना ही पिछले डेढ़ दशकों की प्रतिक्रियाओं से निर्मित है।

• इस स्वतंत्रता दिवस पर बिंदुघाटीकार की यही कामना है कि पाठक, लेखक, प्रकाशक, प्रसारक, प्रचारक सभी विवेकी बनें और अपनी अस्मिता को समझें। साहित्य की आज़ादी त्वरित प्रतिक्रियाओं से मुक्त होने में है।

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अन्य बिंदुघाटी : 2.0 यहाँ पढ़िए : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है | मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है | बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं | शिक्षा मंत्री चला जाएगा, शिक्षा रह जाएगी | ‘देख अपने लीडरों को शोक मत कर... देश ये लीडर नहीं’ | जीटी रोड पर सावन आ गया है

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