बिंदुघाटी 2.0 : मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है
अखिलेश सिंह
12 जुलाई 2026
• कोई भी आंदोलन हर क़ीमत पर एक सामजिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी है। इसमें बहुत से प्रशिक्षित या अनुभवी जन भी होते हैं और बहुत से नए-नए उत्साही जन भी। आंदोलन ब्रिटिश राज़ की ग़ुलामी से निकले एक देश के लिए राष्ट्रीय धरोहर की तरह हैं। प्रायः आंदोलन किसी वृक्ष पर आई हुई मौसमी बहार की तरह नहीं होते कि उनसे तुरंत कोई फल मिलेगा। ये उद्देश्यपूर्ण होते हैं, इसीलिए इनसे मासूम उम्मीदें पालकर आहत नहीं होना चाहिए। जैसे आप अपने जीवन में स्ट्रैटजिक होते हैं, वैसे ही समय-समय होने वाले आंदोलन भी। हो सकता है कि यह आपका इलाक़ा न हो; इसलिए जब तक कुछ सचमुच का दुर्भाग्यपूर्ण न हो, तब तक मुद्दों के प्रति ही आपका छाती-पीटक होना ठीक है—आंदोलनों के प्रति नहीं।
इतना बड़ा देश है, यहाँ किसी एक कोने में बहुत आग लगी हो तो भी बाक़ी देश बहुत आराम से चलता रहता है। एक तबक़ा अपने मुद्दों के लिए बहुत परेशान हो तो भी बाक़ी सारे तबक़े आराम से उत्सवपूर्ण जीवन जीते रहते हैं। सब प्रसंगों में सबको फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि कौन पीड़ित है। इसीलिए तमाम दबाव-समूह सामने आते हैं—बनते हैं, विकसित होते हैं, विकृत होते हैं, ख़त्म होते हैं। फिर कोई नया दबाव-समूह उभरता है—किसी नए मुद्दे के साथ।
लोकतंत्र वहीं नहीं सुनिश्चित हो रहा है, जहाँ स्थापित संस्थाएँ समय-समय पर आपको दिखाती हैं और उसमें शरीक होने का आह्वान करती हैं। विरोधों से ही न्यायपूर्ण व्यवस्था विकसित हुई है और आगे भी होगी। विरोधों को विवेकपूर्ण होना चाहिए, वैसे ही जैसे सरकारों और सत्ता-संस्थाओं को। लेकिन विरोधों का विरोध तो और भी विवेकपूर्ण होना चाहिए।
• लघुकथा
ज़ोरदार ढंग से आंदोलन चल रहा था—कई-कई दिनों से, कई-कई क़िश्तों में। यह बिल्कुल नए दौर का आंदोलन था। यहाँ हर दस आदमी पर एक कंटेंट क्रिएटर मिला। मेरी आँखें कंटेंट क्रिएटरों से बच नहीं सकतीं, आंदोलन हो या वॉशरूम।
कई-कई जगह गुत्थम-गुत्था लोग एक अँगूठे जितनी बड़ी और रोएँदार चीज़ पर बोलने के लिए आंदोलित हुए पड़े थे। मंच पर आख़िर कितने लोग बोलेंगे! जबकि समय का उद्घोष है कि ‘बोलना ही है’। मंच नामधारियों के लिए होता है, जबकि इस रोएँदार अँगूठेनुमा चीज़ ने हर आम-ओ-ख़ास को ज़ब्त कर रखा है।
एक उत्साही युवक दिखा। रोएँदार चीज़ को सँभाल रहे कंटेंट क्रिएटर ने पूछा : “आपका मुद्दा सिर्फ़ पेपर लीक तक ही है!”
युवक इस ‘सिर्फ़’ शब्द का ज़्यादा लोड लेता दिखा, इस जवानी की उछाल में ‘सिर्फ़’ की कैसी जगह!
वह तुनक कर बोला : “नहीं! हम और भी मुद्दों पर बोलेंगे...”
कंटेंटर : “बोलो-बोलो!”
युवक : “मैं मेरठ के गाँव से आता हूँ। प्रधानी के इलेक्शन में बहुत धाँधली होती है। बोट कट जावे हैं। अनपढ़ परधान बन जावे हैं। हम चाहते हैं कि प्रधानी का इलेक्शन हो ही न। इसके लिए भी एग्ज़ाम हो।”
अचानक एक दूसरा युवक हुमच के बोला : “अरे यार इसमें भी परचा लीक होने लगा तो! कमाल करते हो!”
कंटेंटर और बाक़ी घेरेबंद लोग हँसने लगे।
[युवक ने माइक ऑफ़ करवाया। अपने दोस्त कंटेंटर से बोला, “अबे उसका वाला कट कर दियो, ये अपणा बोला ही चलवाना है, देख धूप तो सही जगह पड़ी है!”]
• यहाँ पूर्व-बिंदु में प्रस्तुत लघुकथा में दो सौ से पचास शब्द अधिक हैं; यों यह कथा होना चाहती है, देखें तो उपन्यास या कविता भी। लेकिन इसे इतना ही रहने दिया गया है। इसमें कुछ ज़रूरी की-वर्ड्स हैं—आंदोलन, मंच, इलेक्शन, पेपरलीक, कंटेंट इत्यादि।
इस लघुकथा में कंटेंट-क्रिएटर के लिए बनाए गए संयोजी शब्द—कंटेंटर से ध्वनित हो रहे कितने अर्थ आप तक पहुँचे!
• सारे विवाद बड़ा-बड़ी में ही फलित होते हैं। आपकी किसी बात से मैं पीड़ा-प्रतिशोध और प्रलाप में पड़ सकता हूँ। आप क्या बहुत बड़े ‘वो’ हैं जिससे कुछ सुधार की बातें मिलेंगी! आपकी बात अटैक है, आलोचना तो सिर्फ़ मैं करता हूँ। मैं आपको हरामी मानता हूँ और आप मुझे! लेकिन हम दोनों यही मानते हैं, ऐसी समानता को भी मैं नहीं मानता और आप भी कहाँ! देखिए, मैं बिल्कुल अलग तरह से आपको कुछ या हरामी मानता हूँ। आप लेकिन बिल्कुल उसी तरह से मानते होंगे जिसे मैं अटैक कहता हूँ।
इतनी दुनियावी बकलोली देख-सुनकर ही बहुत-बहुत पहले विजय तेंदुलकर के एक नाटक में नैरेटर बोल उठा : “बराबर के हरामियों में अगर अगला हरामी जीत जाए तो वह अधिक हरामी हो जाता है।”
• फ़ेसबुकिया बौद्धिक दीर्घा में ख़ुराक की तरह ज्ञान बाँचने वालों की भरमार है। बहुत से दृश्यमान महानुभाव हैं, जिन्होंने अपनी सुविधा और लक्ष्य के हिसाब से अपने-अपने इलाक़े चुन लिए हैं। वे उन पर ज्ञान बाँटते रहते हैं। उनकी नज़र जिस पाइप से गुजर रही है, वे उसे कभी साफ़ नहीं करना चाहते हैं। परिणामतः उन्हें धब्बे अधिक दिखते हैं, दृश्य-वस्तु कम। संभवतः उन्हें पढ़ना अधिक चाहिए और लिखना काफ़ी कम। महाभारतकार ने कहा है : “कम पढ़े-लिखे जीव से वेद भी डरते हैं कि यह मुझ पर भी प्रहार कर देगा।”
• वह ऐप ही क्या जो बिल्कुल आपके लिए न बना हो। वह रील ही क्या जो बार-बार आप तक न पहुँचती रहे। इसी तरह एक ऐप की अँग्रेज़ी सिखाकर अँग्रेज़ बना देने वाली इश्तिहारी रील मुझ तक इतनी बार पहुँची कि एक दिन कार्यालय में मैं बोल पड़ा : “कैन यू रिपीट अगेन!”
ओह! यह भारी मिस्टेक थी। अब मुझे सचमुच उस ऐप की ज़रूरत है, क्योंकि उसकी रील से मेरा दिमाग ख़राब होता हुआ पाया गया।
• अनुवादक किसी रचना के प्रति प्रेम के चलते अनुवाद करता है। ऐसी ही क़वायद मशहूर हुई। लेकिन कवि-विद्वान् और विचारक ए.के. रामानुजन ने इस पर कहा कि प्रेम-व्रेम का मामला तो ठीक है, लेकिन अनुवाद करने के लिए इतने श्रमसाध्य प्रेम के अतिरिक्त कुछ अन्य भी पहलू होने चाहिए। हालाँकि अगर उस समय AI महाशय होते तो वह शायद ही यह श्रमसाध्य वाली बात कह पाते!
उन्होंने ठीक-ठीक यों कहा : “वन ट्रांसलेट्स नॉट जस्ट आउट ऑफ़ लव, बट आल्सो आउट ऑफ़ एन्वी ऑफ़ पास्ट मास्टर...”
अर्थात् : कोई भी सिर्फ़ प्रेम में पड़कर अनुवाद नहीं करेगा, अपितु यह पूर्व-रचयिता के प्रति ईर्ष्या का भी मामला है।
रामानुजन की बात इतनी नैतिक और गंभीर लगती है कि उसे मानने को मन न करे तो अनैतिक महसूस होने लगता है। वह रचनात्मक ईर्ष्या की बात कर रहे हैं। वह कहते हैं कि इसके लिए अनुवादक का भी रचनात्मक होना आवश्यक है। वह आज के समय में दिख रहे खड़े-खड़े सपाट अनुवाद की बात नहीं कर रहे हैं। वह वैसे अनुवाद की बात कर रहे हैं जो कि पुनर्रचना के क़रीब पहुँच जाए। लेकिन इसके लिए अनुवादक का स्वयं उस स्तर का होना आवश्यक है।
• जुगनुओं को क्या ही सूर्य से ईर्ष्या होगी! वे तो किसी रचना का अनुवाद इधर-उधर छपवाकर बधाई-शुभकामना लेने और परिचय में लेखक-अनुवादक जैसा पुछल्ला जुड़ जाने की सस्ती क़वायद में हैं। अनुवाद के मामले में जो यह प्रेम के साथ-साथ रचनात्मक ईर्ष्या है, यह अनुवादक की ऐसी ज़िद से प्रकट होती है कि मैं इस टेक्स्ट को अपना और अपनी भाषा का बनाकर रहूँगा। ऐसे ही अनुवादों से मूल-टेक्स्ट ज़िंदा रहते हुए अमरता को प्राप्त करता है। ऐसे ही अनुवादों की बात कवि-अनुवादक असद ज़ैदी के हवाले से ‘बिंदुघाटी’ के दूसरे सत्र के पहले एपिसोड में की गई थी।
• मध्यकाल हो या उपनिवेशों का काल—ज्ञान के क्षेत्र में अनुवाद के काल भी कहे जा सकते हैं। उस समय सरकारी परियोजनाओं के तहत बहुत से अनुवाद हुए, जो कि आज भी होते हैं। अनुवाद ऐसी कोई शय नहीं है जिसकी राजनीति और आर्थिकी की पड़ताल न की जाए। अपने पाँव जमाने के लिए नए प्रकाशक अनुवादों का सहारा लेते हैं। कवि या लेखक अपने प्रसार के लिए अनुवादकों के संपर्क में रहता है या बहुभाषी होने के कारण स्वयं ही अपना टेक्स्ट अनूदित करता है। समय-समय पर इनके वर्कशॉप भी होते हैं, वहाँ भी चयन और बहिष्करण होते हैं। वे भी राजनीतिक निहितार्थों से ही होते हैं।
• हिंदी कवि शंकरानंद ‘कौशिकी’ नामक ब्लॉग चलाते हैं। अभी हाल ही में उन्होंने इसके एक वर्ष पूर्ण होने की सूचना दी। इस ब्लॉग में कविताएँ ही कविताएँ प्रकाशित होती हैं और उन पर दिलचस्प टिप्पणियाँ आती हैं। विगत दिनों ऐसे ही किसी कवि की प्रकाशित कविताओं पर अष्टभुजा शुक्ल ने एक टिप्पणी की। इस टिप्पणी की पहली पंक्ति है : “चीरने और हँफाने वाली कविताएँ...”
अष्टभुजा शुक्ल जैसे बुज़ुर्ग कवि को अब इस उम्र यों चीर देना और हँफा देना ठीक नहीं है। मुझे कविताएँ अच्छी नहीं लगीं और इसी बात को उसका प्रमुख कारण माना जाए।
• रोमैंटिक कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने अपने प्रसिद्ध आलोचकीय उद्बोधन—‘प्रीफ़ेस टू द लिरिकल बैलेड’ में कविता की परिभाषा दी है : “कविता तीव्र भावनाओं का स्वच्छंद प्रवाह है...” और ये भावनाएँ अभिव्यक्त कैसे होती हैं? उसी वाक्य में आगे है कि प्रशांति के क्षणों में उन भावनाओं के स्मरण के द्वारा। यानी काम उस इमोशन से ही लेना है, लेकिन वह इतनी उछर-माछर न हो कि कविता के लिए कहना पड़ जाए कि बहुत इमोटिव या इम्पल्सिव कविता है।
इधर के अपने कवि-समकालीनों को देखते हुए बार-बार वर्ड्सवर्थ की परिभाषा पर ध्यान जाता है। समकालीन हिंदी कविता का अधिकांश स्वच्छंद प्रवाह में है, भावनाओं से लबालब भी है; लेकिन वह विसर्जित भावनाओं से पूरमपूर है। यह कविता कचरे के ढेर की तरह झम्म से गिरती है। इसे ही पावरफुल फ़ीलिंग्स कहें तो वर्ड्सवर्थ की वह परिभाषा दिखेगी, लेकिन अधूरी।
• अभी जिन कविताओं को महज़ आक्रोश, विद्रोह, प्रतिरोध जैसे शब्दों से नवाज़ दिया जा रहा है, सवाल है कि वे किसका प्रतिरोध कर रही हैं! कौन से फ़ॉर्मूले उन्हें जन्म दे रहे हैं। ज़ाहिर है कि ये कोई बहुत पेचीदे सवाल नहीं हैं। लेकिन इनके सोदाहरण जवाब मैं नहीं दूँगा। लेकिन आप इन्हें जानिए ज़रूर। अगर आप इन्हें पढ़ते हैं तो ख़ुद से जानिए।
• कविता को ‘हुँकारी भावनाओं का स्वच्छंद प्रवाह’ न बनने दीजिए। वे आत्मलीनता से आईं हैं या आत्महीनता ही उनकी प्रसूता है! उनकी ध्वनियाँ कैसी हैं इसे समझिए। ख़ारिज कीजिए। कविताओं को अनवरत ख़ारिज किए जाने की ज़रूरत है, इससे ही एक दर्ज किए जाने लायक़ कवि-समय बनेगा।
• कविता बड़े-बड़े दरवाज़ों से अर्राती हुई नहीं, झरोखों और दरारों से भटकती रश्मियों, झिरझिराती हवाओं और कूकती सारिकाओं की तरह आती है और जब वह सचमुच आ जाती है तो कवि मन में बारहों आदित्य, उनचासों मरुत और कूकता हुआ सारिकायूथ एक साथ तत्क्षण उपस्थित होते हैं।
• निसीम इज़ीकील आधुनिक भारतीय अँग्रेज़ी कविता के लिए उसी तरह हैं, जैसे आधुनिक हिंदी कविता के लिए निराला। उनकी कविता ‘एंटरप्राइज़’ की सबसे आख़िरी पंक्ति है : “होम इज व्हेयर वी हैव टू गेदर ग्रेस...”
• ‘एंटरप्राइज़’ में तीर्थयात्रा पर निकले लोग अंततः यह भूल ही जाते हैं कि वे क्यों निकले थे। आज के बिलबिलाते टूरिज़्म के लिए यह बात सही है। लोग घूमने जाते हैं कि रिफ़्रेश हो सकें, जबकि लौटते वक़्त तस्वीरों में बदलकर वे फिर से बासी हो चुके होते हैं। उनके पास उपद्रव की कहानियाँ होती हैं और किसी अन्य ट्रिप की उन्मादी योजना। वे जो ग्रेसफ़ुल तरीक़े से अपने घर में नहीं रह सकते; उन्हें पहाड़-सागर-आइलैंड क्या रिफ़्रेश करेंगे, सिवाय उनके द्वारा दूषित होते जाने के।
• वे जो यू-ट्यूबर होकर देश और समाज की समस्याएँ ठीक करते हुए ख़ुद कई-कई मामलों में सेटल हो गए, अब आप उनका क्या कर लेंगे! वे अब सेटल हो गए हैं, उन्हें अनसेटल नहीं किया जा सकता।
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अन्य बिंदुघाटी : 2.0 यहाँ पढ़िए : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है
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