प्रदीप अवस्थी के बेला
प्रस्तुत नहीं : अकेलापन कोई चुनता नहीं, वह दे दिया जाता है
कितना कुछ घट रहा है। दुनिया में, देश में, मुझ में। बहुत उलझन में हूँ। बहुत सारी बातें एक साथ सोच रहा हूँ। अपने मस्तिष्क में हर चीज़ का, हर स्थिति का हिसाब लगाने की कोशिश करता हुआ—घर के एक कोने से दूस