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पतन पर उद्धरण

यदि चलताऊ क़िस्म के साहित्य की माँग और प्रचार अधिक है, तो उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दूसरे क़िस्म का साहित्य असामाजिक और ऐकांतिक है, बल्कि यह कि जनसाधारण का स्तर प्रौढ़ता का स्तर नहीं। ऐसी दशा में साधारणीकरण या शायद निम्नस्तरीकरण पर अधिक ज़ोर देना, प्रौढ़ एवं गंभीर साहित्य की संभावनाओं को कुंठित करना होगा।

कुँवर नारायण

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