प्यारी बहनो,
न तो मैं कोई विचारक हूँ, न प्रचारक, न लेखक, न शिक्षक। मैं तो एक बड़ी मामूली-सी नौकरीपेशा घरेलू औरत हूँ, जो अपनी उम्र के बयालीस साल पार कर चुकी है, लेकिन इस उम्र तक आते-आते जिन स्थितियों से मैं गुज़री हूँ, जैसा अहम् अनुभव मैंने पाया...चाहती हूँ, बिना किसी लाग-लपेट के उसे आपके सामने रखूँ और आपको बहुत सारे ख़तरों से आगाह कर दूँ। मैं जानती हूँ कि अपने जीवन के निहायत ही निजी अनुभवों को यों सरेआम कहकर मैं ख़ुद अपने लिए बहुत बड़ा ख़तरा मोल लूँगी। मेरे मात्र पाँच साल के अल्पकालीन विवाहित जीवन पर भी संकट आ सकता है, पर क्या करूँ, मेरा नैतिक दायित्व मुझे ललकार रहा है कि अपनी हज़ार-हज़ार मासूम किशोरी बहिनों को...जो या तो ऐसी ही स्थिति में पड़ी हैं या कि कभी भी पड़ सकती हैं...अपने अनुभव से कुछ नसीहत दूँ, बर्बादी की ओर जाने से बचा लूँ, ख़तरा उठाकर भी यदि मैं दो-चार बहिनों की...
क्या कहा, आपकी दिलचस्पी बेकार की लफ्फ़ाज़ी में नहीं है! आप असली बात जानना चाहती हैं! बहुत अच्छे! लफ्फ़ाज़ी के प्रति यदि आपके मन में अरुचि है, तो यह शुभ लक्षण है। बहुत शुभ। आप शर्तिया बहुत सारे ख़तरों से बची रहेंगी। साँप काटा और बातों का मारा व्यक्ति बेचारा उठ ही नहीं पाता। मुझे ही देखिए, मेरी जो दुर्दशा हुई थी, उसका कारण...
अच्छा-अच्छा, अब एक भी बेकार की बात नहीं। बिना किसी लाग-लपेट के सीधी बात सुनिए। सीधी और सच्ची।
मेरा अपने बॉस से प्रेम हो गया। वाह! आपके चेहरों पर तो चमक आ गई। आप भी क्या करें? प्रेम कमबख़्त है ही ऐसी चीज़। चाहे कितनी ही पुरानी और घिसी-पिटी क्यों न हो जाए…एक बार तो दिल फड़क ही उठता है...चेहरे चमचमाने लगते हैं। ख़ैर, तो यह कोई अनहोनी बात नहीं। डॉक्टरों का नर्से से, प्रोफ़ेसरों का अपनी छात्राओं से, अफ़सरों का अपनी स्टैनो-सेक्रेटरी से प्रेम हो जाने का हमारे यहाँ आम रिवाज है। यह बात बिलकुल अलग है कि उनकी ओर से इसमें प्रेम कम और शग़ल ज़्यादा रहता है। पर यह बात तो मुझे बहुत बाद में समझ में आई। मैंने तो अपनी ओर से पूरी ईमानदारी के साथ ही शुरू किया था। ईमानदारी और समर्पण के साथ।
शिंदे नए-नए तबादला होकर हमारे विभाग में आए थे। बेहद ख़ुशमिज़ाज और ख़ूबसूरत। आँखों में ऐसी गहराई कि जिसे देख लें, वह गोते ही लगाता रह जाए। बड़ा शायराना अंदाज़ था उनका और जल्दी ही मालूम पड़ गया कि वे कविताएँ भी लिखते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में वे धड़ाधड़ छपती भी रहती हैं और इस क्षेत्र में उनका अच्छा-ख़ासा नाम है। आयकर विभाग की अफ़सरी और कविताएँ। हैं न कुछ बेमेल-सी बात। पर यह उनके जीवन की हक़ीक़त थी।
मैं स्थितियों और उमर के उस दौर से गुज़र रही थी, जब लड़कियों में प्रेम के लिए एक विशेष प्रकार का लपलप भाव रहता है। बूढ़ी माँ तीनों छोटे भाई-बहिनों को लेकर गाँव में रहती थी और मैं इस महानगरी में कामकाजी महिलाओं के एक होस्टल में। न घर का कोई अंकुश था और न इस बात की संभावना कि वे कहीं मेरा ठौर-ठिकाना लगा देंगे। मेरा ठिकाना वे लगाते भी क्या, उनकी ज़िंदगियाँ ठिकाने लगी रहें और घर की मशीन जैसे-तैसे चलती रहे, इसके लिए मुझे ही हर महीने मनीआर्डर में तेल डालकर भेजना पड़ता था। सब ओर से असुरिक्षत और असहाय होकर ही मैंने ज़िंदगी के सत्ताईस साल पूरे कर लिए और एकाएक ही मुझे लगने लगा कि नहीं, इस तरह अब और नहीं चलेगा। हर रोज़ हज़ार-हज़ार इच्छाएँ मुँह बाएं खड़ी रहतीं और मैं उनके सामने ढेर हो जाती। आख़िर मैंने अपनी नाक और आँखों को कुछ अधिक सजग और तेज़ कर लिया। बस, ऐसा करते ही मुझे हर नौजवान की नज़रों में अपने लिए विशेष संकेत दिखने लगे और उनकी बातों में विशेष अर्थ और आमंत्रण की गंध आने लगी। तभी भिड़ गया शिंदे। उसके तो संकेत भी बहुत साफ़ थे...निमंत्रण भी बहुत खुला। लगा क़िस्मत ने छप्पन पकवानों से भरी थाली मुझ भुक्कड़ के आगे परोसकर रख दी है। सो मैंने न उसका आगा-पीछा जानने की कोशिश की और न अपना आगा-पीछा सोचने की। बस आँख बूँदी और प्रेम की डगर पर चल पड़ी।
हर प्रेम की शुरुआत क़रीब-क़रीब एक-सी ही होती है। प्रेमियों की वे सारी बातें चाहे जितनी रोमांचकारी और गुदगुदानेवाली लगें, देखने-सुननेवालों को बड़ी उबाऊ और सपाट लगती हैं। घबराइए नहीं, मैं आपको उन बातों से क़तई बोर करने नहीं जा रही। बस, इतना ही समझ लीजिए कि शामें हमारी किसी रेस्तराँ के नीम-अँधेरे कोने में बीततीं, तो कभी बाग़ के झुरमुट के बीच। कभी हम आपस में उँगलियाँ उलझाए रहते, तो कभी वह मेरी लटों से खिलवाड़ करता रहता। एक बार उसने कविता में मेरे बालों की उपमा बदली से दे दी। बस, फिर क्या था, मैं जब-तब गोदी में रखे उसके सिर पर झुककर बदली छितरा देती और वह उचककर...
यह क्या, आपकी आँखों में तो अविश्वास उभर आया। मैं समझ गई। एक सीनियर अधिकारी और ऐसी छिछोरी फ़िल्मी हरकतें। पर सच मानिए, अब भी मैं दावे के साथ कहती हूँ कि यहाँ के हर पुरुष के भीतर एक ऐसा ही फ़िल्मी हीरो आसन मारे बैठा रहता है और जब तक वह पूरी तरह तृप्त न हो जाए, मरता नहीं। उम्र के किसी भी दौर पर, उस समय चाहे वह छह बच्चों का बाप ही क्यों न हो...ज़रा-सा मौक़ा मिलते ही भड़भड़ाकर जाग उठता है और पूरी तरह अपनी गिरफ़्त में जकड़ लेता है। फिर तो बड़ी-बड़ी तोपें तक ऐसी बचकाना और बेवकूफ़ाना हरकतें करती हैं कि बस तौबा! न कोई शर्म, न उम्र का लिहाज़ । आजकल की लड़कियों ने इस राज़ को अच्छी तरह समझ लिया है, इसलिए वे शादी करते ही हनीमून की जान को लग जाती हैं। फिर किसी पहाड़ी जगह में, सारे नाज़-नखरों के साथ, फ़िल्मी अदाकारी की तर्ज पर प्रेम के ऐसे-ऐसे दिलकश दाँव-पेंच दिखाती हैं कि हीरो साहब पूरी तरह ढेर! कम-से-कम आगे के दस साल तो सुरक्षित। पर हनीमून की नौबत तो शादी के बाद ही आती है न! मैं तो उन बहिनों को सावधान करना चाहती हूँ, जो शादी से पहले ही इस हीरो के चंगुल में आकर अपने को चौपट कर लेती हैं।
माफ़ करिए, फिर बहक गई! क्या करूँ? चाहती हूँ इस प्रसंग की एक-एक बारीकी आपको समझा दें। वरना इस चक्कर में फँसने के बाद तो समझ एकदम भोंथरी हो जाती है, जैसे मेरी हो गई थी। हाँ, तो मेरा और शिंदे का प्रेम चल निकला। एक बात साफ़ कर दें, बहुत ज़रूरी है। आप कहीं यह न समझ लें कि मैं शिंदे से इसलिए प्रेम करने लगी थी कि वह मेरा बॉस था और उसके प्रेम के प्रकाश में मुझे अपना कैरियर दिप-दिपाता हुआ दिखाई दिया। नहीं, प्रेम जैसी पवित्र चीज़ को मैं घटिया क़िस्म के स्वार्थों से अलग करके ही देखती थी। तभी तो पूरे आठ साल तक शिंदे के प्रेम की अखंड जोत जलाए अपने को होम करती रही।
लीजिए, आप हँस रही हैं! क्या करूँ, मुश्किल यह है कि टुच्चे लोगों ने प्रेम में निहायत ही घटिया क़िस्म की घालमेल करके उसे इतना हल्का, झूठा और बाज़ारू बना दिया है कि उसके असली रूप की बात करते ही लोग हँसने लगते हैं। पर आप मेरी बात का यक़ीन मानिए...मेरा प्रेम क़तई-क़तई कैरियर-ओरिएंटेड नहीं था। बड़ी मुश्किल में पाए हुए अपने इस विवाहित जीवन को दाँव पर लगाकर, अपनी जो यह दुःखभरी गाथा सुना रही हूँ, वह भी केवल उन्हीं बहिनों के लिए, जो प्रेम को मीराबाई के भाव से ग्रहण करती हैं।
हाँ, तो मैं पूरी तरह शिंदेमयी हो गई, पर तभी एक भयंकर झटका लगा। बल्कि कहूँ कि जो लगा, उसके लिए झटका शब्द हल्का ही है। मालूम पड़ा कि शिंदे के एक अदद बीवी है, जो पहली बार पुत्रवती बनकर पाँच महीने बाद अपने मैके से लौटी है। यानी एक अदद बीवी और एक अदद बच्चा। मुझे तो सारी दुनिया ही लड़खड़ाती नज़र आने लगी। लगा मैं बहुत बड़ा धोखा खा गई हूँ। मेरे भीतर ग़ुस्सा बुरी तरह बलबलाने लगा। इसने यह बात बताई क्यों नहीं? और बीवी-बच्चे के रहते मेरी ओर प्रेम का हाथ बढ़ाने का मतलब? मैंने जब भी उससे घर और घरवालों के बारे में पूछा, वह तीन-चार शेर दोहरा दिया करता था, जिनका शाब्दिक अर्थ होता था, ‘मेरा न कोई घर है न दर, न कोई अपना न पराया। इस ज़मीन और आसमान के बीच मैं अकेला हूँ, बिलकुल अकेला।’, पर मेरे लिए इन शेरों का सीधा-सीधा अर्थ था—हरी झंडी, लाइन क्लीयर। सो मैं सपाटे से चल पड़ी, बल्कि चलने में थोड़ी फुर्ती भी की। आप तो जानती ही होंगी कि इस उम्र तक शादी न होने पर लड़कियों में ख़ास तरह की हड़बड़ाहट आ जाती है। चाहती हैं, जैसे भी हो, जल्दी-से-जल्दी प्रेमी को पूरी तरह क़ब्ज़े में करके, पति बनाकर अपनी टेंट में खोंस लें। झूठ नहीं बोलूँगी। मैं भी इसी नेक इरादे से लपक रही थी कि बीच में ही औंधे मुँह गिरी।
पर गिरने नहीं दिया शिंदे ने। हाथों-हाथ झेल लिया। ग़ुस्से से मैं पगला रही थी और आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी। मन हो रहा था, सामने बैठे इस आदमी की चिन्दियाँ बिखेरकर रख दूँ और फिर कभी इसकी सूरत नहीं देखें। पर उसने बिना किसी बात का मौक़ा दिए मुझे बाँहों में भर लिया और धुआँधार रोने लगा “पिता के दबाव में आकर की हुई शादी मेरे जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजेडी बन गई...बीवी के रहते भी मैं कितना अकेला हूँ...दो अजनबियों की तरह एक छत के नीचे रहने की यातना...” ऐसी-ऐसी बातों के न जाने कितने टुकड़े आँसुओं में भीग-भीगकर टपक रहे थे। मेरा विवेक मुझसे संकल्प करवा रहा था कि लौट जाओ, इस दिशा में अब एक क़दम भी आगे मत बढ़ो। मैं रो-रोकर अपना संकल्प दोहरा रही थी। यह रो-रोकर अपना दुःख दोहरा रहा था।
इसी तरह हम दो-तीन बार और मिले। वही बातें, वही रोना। मैंने सोचा था कि आँसुओं के साथ मैं अपना सारा प्रेम और ग़म भी वहाँ हमेशा के लिए अलविदा कहकर लौट जाऊँगी। पर हुआ एकदम उल्टा। आँसुओं के जल से सिंचकर प्रेम की बेल तो और ज़्यादा लहलहा उठी। अब देखिए न, मीरा का पद—‘अँसुवन जल सींच-सींच…’ बचपन में पढ़ा था। पर हम सबकी ट्रेजेडी यही है कि स्कूली शिक्षा को जीवन में गुनते नहीं। शिक्षा एक तरफ़, जीवन एक तरफ़ और इसीलिए ठोकर खाते हैं। यही हुआ। उसका दुःखी और दयनीय चेहरा देखकर मेरे मन में प्रेम का ज्वार उमड़ने लगा। उसके आँसुओं ने प्रेम को इतना गीला और रपटीला बना दिया कि वापस मुड़ने को तैयार मेरा पैर, अपने आपको स्वाहा करने के लिए आगे बढ़ गया।
पर इतना सब करने के बावजूद मेरी आँखों में जब-तब संदेह और आशंका के डोरे उभर आते । मेरी पकड़ में पहले जैसी मज़बूती नहीं रह गई, शिंदे इस मैदान का पक्का खिलाड़ी था। मेरे असमंजस और दुविधा को चट भाँप गया। केवल भाँप ही नहीं गया, वरन् उसने यह भी महसूस कर लिया कि बीवी की उपस्थिति से हमारे प्रेम में आपातकालीन स्थिति पैदा हो गई है। अब यदि इसे बचाकर रखना है, तो प्रेम करने के तरीक़े में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाना होगा। बिना उसके मामला चलनेवाला नज़र नहीं आ रहा था। रेस्तराँ और बाग़-बग़ीचों के बीच तो यह परिवर्तन आ नहीं सकता था, इसलिए बड़ी शिद्दत के साथ एक कमरे की तलब महसूस होने लगी। वैसे पहले भी कई बार वह अपनी इस तरह की इच्छा और ज़रूरत का इज़हार कर चुका था, पर निश्चय ही मैं पहले बड़े संस्कारोंवाली लड़की थी। हर तरह की मर्यादा में मेरा पूरा विश्वास था। उस तरह के आमंत्रण को मैं स्वीकार कर ही नहीं सकती थी, पर स्थिति ने मुझे हिसाबी-किताबी बना दिया था। मन-ही-मन मैंने जोड़-बाक़ी लगाकर देख लिया कि यदि पूरी तरह पाना है तो अपने को पूरी तरह देना भी पड़ेगा।
तीन-चार कमरा-मुलाक़ातों में ही मैंने समझ लिया कि इन मुलाक़ातों के कारण उसके भीतर किसी तरह का अपराधबोध या कुछ ग़लत करने का भाव लेशमात्र भी नहीं है। वह काफ़ी तृप्त और छका हुआ लगता था। मुझे समझते देर नहीं लगी कि शरीर के स्तर पर भी मैंने अपने को उसके लिए अनिवार्य बना लिया है। मुझे पक्का विश्वास हो गया कि मेरा यह समर्पण तुरुप के इक्के की तरह कारगर सिद्ध होगा और बाज़ी मेरे हाथ। निश्चय ही इन मुलाक़ातों ने मेरे प्रेम को बड़ी मज़बूत बैसाखियाँ थमा दीं और मेरे लड़खड़ाते क़दम फिर जम गए।
वह मेरे साथ भविष्य की योजनाएँ बनाता, पर उन्हें अमल में लाए, तब तक के लिए एक मौन समझौता हम लोगों के बीच हो गया। अपना शरीर, अपनी भावनाएँ उसने मेरे ज़िम्मे कर दीं और घर, बच्चा, बूढ़ा बाप और सारी पारिवारिक खिचखिच बीवी के ज़िम्मे। इस विभाजन से मैं कुछ समय के लिए परम प्रसन्न। यों भी इस उम्र में आदमी को सबसे ज़्यादा भरोसा अपने शरीर पर ही होता है। शरीर पा लिया, समझो दुनिया-जहान हथिया लिया। ऊपर से मुझे वह कभी बातों से, तो कभी कविताओं से समझाता रहता कि मन और शरीर की पवित्र भूमि पर ही असली प्रेम पनपता है। घर की चहारदीवारी के बीच निरंतर होनेवाली खिचखिच में तो वह मरता ही है। मैं समझती रहती और अपने को बहुत पुख़्ता ज़मीन पर महसूस करती। वह बातें ही ऐसी करता कि संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता। मुझे पूरा विश्वास था कि एक दिन वह बँटे से उखड़कर मेरी गिरफ़्त में आ जाएगा।
बीवी की याद और बात से ही शिंदे अपना चेहरा एकदम मायूस बना लेता और बिना कहे ही मेरे दिमाग़ में यह बिठाने की कोशिश करता कि बीवी बनते ही औरत बहुत उबाऊ और त्रासदायक बन जाती है कि रिश्तों में बँधते ही प्रेम नीरस और बेजान हो जाता है कि सच्चे प्रेमियों को तो हमेशा मुक्त ही रहना चाहिए। मैं इन सब बातों को सुनती-समझती तो सही, पर गले नहीं उतार पाती, क्योंकि बीवी बनने की ललक जब-तब मेरे भीतर ज़ोर मारती रहती थी। सच बात है, मुझे तो घर भी चाहिए था, पति भी और बच्चे भी। पर उसे तो जैसे बीवी नाम से ही चिढ़ हो गई थी। कभी-कभी तो वह अपनी बीवी के कर्कश स्वभाव और तुनकमिज़ाज़ी की बात करते-करते रो तक पड़ता। तब मैं लपककर उसे बाँहों में भरती, अपने होंठों से उसके आँसू पोंछती और उसे हौसला बँधाती कि जल्दी ही हम कुछ ऐसा करेंगे कि वह इस दुःख से मुक्त हो कि मैं उसे एक सही, सुखद ज़िंदगी दूँगी। यह आश्वासन उसके लिए कम, मेरे अपने लिए ज़्यादा होता था।
दिन सरकते जा रहे थे और अपने प्रेम करने के तरीक़े में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के बावजूद स्थिति जहाँ-की-तहाँ थी, यानी कि मैं अपने हॉस्टल के कमरे में बंद, शिंदे अपनी बीवी की मुट्ठी में। साल भर पहले का जागा आत्मविश्वास फिर डगमगाने लगा और मुझे लगा कि अब कोई धाँसू कार्यक्रम अपनाना पड़ेगा।
आज सोचती हूँ तो अपने पर ही सौ-सौ धिक्कार के साथ आश्चर्य भी होता है कि कैसे मेरी बुद्धि पर ऐसा मोटा परदा पड़ गया था कि यह भी नहीं सोच सकी कि उसकी बीवी भी आख़िर मेरी तरह ही एक स्त्री है...अपने पति के छलावे और मक्कारी की शिकार। पर नहीं, यह तब समझ में आया जब उसकी मक्कारी तबाही के कगार पर ला पटका। झूठ नहीं बोलूँगी, उस समय तो उसके प्रेम में अंधी होने के कारण, वह जो कुछ कहता-समझता, मुझे उस पर पूरा यक़ीन ही नहीं होता बल्कि मैं भी उस की तरह दुनिया-भर के छल-छंद सोचा करती। तभी तो मैंने सोचा कि उसकी बीवी को हमारे प्रेम-प्रसंग की जानकारी तो अवश्य होगी...वह काफ़ी दुःखी भी होगी...क्यों न मैं जब-तब वहाँ उपस्थित होकर उसके त्रास को इतना बढ़ा दूँ कि वह ख़ुद ही इस अपमानजनक स्थिति को नकारकर अलग हो जाए। रक़ीब को सामने देखकर अच्छों-अच्छों के हौसले पस्त हो जाते हैं, फिर अपमान और उपेक्षा की आग में झुलसी इस औरत का हौसला ही क्या होगा! और यही सोचकर आख़िर मैं एक दिन शिंदे के घर जा धमकी।
एक सुहागिन औरत की सारी नियामतों यानी कि बूढ़े ससुर के वरदहस्त की छत्र-छाया और बच्चों के पोतड़ों की बंदनवार के बीच, दूधों नहाई, पूतों फली भाव से वह कुर्सी पर विराजमान थी। मुझे देखकर उसके चेहरे पर किसी तरह का कोई विकार नहीं आया। बस, सहजता में लिपटा एक प्रश्नवाचक उभरा और ‘हरखू, इन्हें बिठाओ और साहब से बोलो, कोई मिलने आया है’ के साथ बिला गया। विकार तो मुझे देखकर शिंदे के चेहरे पर आया, जिसे उसने थोड़ी-सी कोशिश करके अफ़सरी नक़ाब के नीचे ढक लिया। दफ़्तरी भाषा में दफ़्तरी बातें करके उसने मुझे चलता किया। पर बाहर निकलते समय हाथ दबाकर लाड़ में लिपटी हल्की-सी फटकार के साथ शाम को कमरे पर आने का निमंत्रण भी दे दिया।
मैं उसकी बीवी को त्रस्त करने गई थी, पर ख़ुद त्रस्त और पस्त होकर लौटी। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि यह औरत है या मांस का लौंदा? इसका आदमी तीन साल से एक दूसरी लड़की के साथ मस्ती मार रहा है और इसे न कोई तकलीफ़, न कष्ट। मैं इसकी जगह होऊँ, तो शायद एक दिन भी इस तरह की अपमानजनक स्थिति को बर्दाश्त न करूँ। इसके शरीर पर चमड़ी लिपटी है, या गैंडे की खाल? यह तो मुझे बहुत बाद में अपने अनुभव ने सिखाया कि अधिकतर शादीशुदा औरतें ऐसी होती हैं, जिन्हें अपने घर की दीवारों से बेशुमार लगाव होता है। इतना ज़्यादा कि धीरे-धीरे उन दीवारों को ही अपने शरीर के चारों ओर लपेट लेती हैं। फिर मान-अपमान के सारे हमले उनसे टकराकर बाहर ही ढेर हो जाते हैं और वे उनसे बेअसर सती-साध्वी-सी भीतर सुरक्षित बैठी रहती हैं।
शाम को शिंदे मुझ पर बरस पड़ा कि मैंने उसके घर जाने की मूर्खता क्यों की? कितना चौकस रहना पड़ता है उसे हर समय जिससे उसकी बीवी को इस प्रसंग की हवा भी न लग सके। वरना तो वह शूर्पनखा की तरह ऑफ़िस, परिवार और सारे शहर में हड़बौंग मचाकर रख देगी। मौक़ा लगा तो मेरा झोंटा पकड़कर सड़क पर जूते लगवाएगी, और बड़ी चालाकी से उसने मेरे मन में अपनी पत्नी के लिए, जिसे वह अक्सर कोतवाल कहता था—ढेर सारी नफ़रत और आक्रोश भर दिया। साथ ही जल्दी करने की अपनी नादानी-भरी मूर्खता पर मुझे बेहद शर्मिंदा भी किया।
देखा आपने कि कैसे शातिराना अंदाज़ से पुरुष नफ़रत और ग़ुस्से की सुई अपनी ओर से सरकाकर दोनों औरतों की ओर घुमा देता है। वे ही आपस में लड़ें-भिड़ें, कोसें-गलियाएँ और वह जो असली गुनाहगार है, अपने पर आँच आए बिना आराम से दोनों का सुख भोगता रहे। पर उस समय तो मैं जब-जब बहुत अधीर होती, वह समझाता कि सहजीवन का मधुरतम पक्ष तो हम भोग ही रहे हैं, मैं क्यों बेकार में शादी-ब्याह और घर में जकड़कर इस मधुर संबंध का गला घोंटना चाहती हूँ। और इसी चक्कर में वह मधु उँड़ेलती हुई तीन-चार फड़कती कविताएँ मेरे नाम ठोंक देता। कुछ समय के लिए मुझे लगने लगता कि मैं आम औरत से कुछ अलग, कुछ विशिष्ट, कुछ ऊँची हूँ। मेरे कंधों पर स्त्री-पुरुष के संबंधों को एक नई दिशा देने का दायित्व है। अगली पीढ़ी अधिक स्वस्थ, अधिक मुक्त ज़िंदगी जी सके, इसके लिए हमें पहल करनी होगी, एक उदाहरण रखना होगा—चाहे उसके लिए हमें खाद ही क्यों न बनना पड़े। शिंदे तो ये बातें झाड़कर मज़े से अपनी बीवी का बगलगीर हो जाता और मैं असली अर्थों में खाद बनी कमरे में सड़ती रहती।
तभी शिंदे का तबादला हो गया। मैं एकबार फिर डगमगा गई। मुझे लगा कि बस, अब यह मेरी ज़िंदगी से निकला। रो-रोकर मेरा बुरा हाल था, पर फिर उसने मुझे हाथों-हाथ झेल लिया। एक नई योजना से मेरे आँसू पोंछ दिए। तय हुआ कि नई जगह अभी वह अकेला ही जाएगा और उसके जाने के तीन-चार दिन बाद ही मैडिकल-लीव लेकर मैं उसके पास पहुँच जाऊँगी। उसने मुझे बताया कि उसने यह तबादला करवाया ही इसलिए है कि शहरी तबादला उसकी ज़िंदगी के तबादले की भूमिका बन जाए। यह तो मुझे बाद में मालूम पड़ा कि शिंदे ने तबादला इसलिए करवाया था कि हमारे रिश्ते की सुरसुराहट उसकी बीवी के कानों तक पहुँचने लगी थी। बात पूरी तरह खुले, उसके पहले ही वह शहर छोड़ देना चाहता था। पर मैं तो यह समझकर कि केवल मेरी ख़ातिर शिंदे ने बड़े शहर की बड़ी संभावनाओं को छोड़ छोटी जगह चुनी है, एकदम निहाल हो गई और उसकी बातों के जादू में बँधी-बँधी एक सप्ताह बाद ही उसके पास पहुँच गई।
आपको बहुत ग़लत लग रहा है न? लगना ही चाहिए। अब तो मुझे भी लगता है। पर उस समय तो बस, शिंदे में ही मेरे प्राण बसते थे...लगता था, उसके बिना जी नहीं सकूँगी। ग़लत-सही की समझ ही कहाँ रह गई थी! मैं उसे पाना चाहती थी और वह मुझे खोना नहीं चाहता था।
उसके साथ होटल में गुज़ारे वे दिन! मैं तो भूल ही गई कि हम दोनों के बीच कोई तीसरा भी है। तबीयत एकदम लहलहा उठी। इस बार उसने बाक़ायदा योजना बनाई कि पत्नी को अब यहाँ न बुलाकर उसके पिता के घर भेज देगा और धीरे-धीरे उसे क़ानूनी कार्रवाई करने के लिए राज़ी कर लेगा...यदि नहीं हुई, तो मजबूर करेगा।
पंखों पर सवार होकर ही मैं लौटी थी। आँखों में उसने ढेर सारे सपने आँज दिए थे और उठते-बैठते मुझे अपना स्वीट-होम ही दिखाई देता। मैंने उसे एक फड़कता हुआ प्रेम-पत्र लिखा। बातों का तो वह बादशाह था ही, पत्र लिखने में भी उसे कमाल हासिल था। शरीरों में जो दूरी आ गई थी, उसे वह पत्रों की भाषा से पाटता रहता। पत्रों में मुझे वह ‘दिव्य-प्रेम’ का दर्शन समझाता। मेरे जन्मदिन पर अपने इसी दिव्य-प्रेम में डुबोकर उसने एक ख़ूबसूरत-सा तोहफ़ा मेरे लिए भेजा। कभी वह चाँदनी रात के गीत लिखकर भेजता, तो कभी साथ बिताए मधुर क्षणों की याद को ताज़ा करनेवाली कविताएँ।
जानता था कि इन बातों से मुझे तसल्ली नहीं होगी, इसलिए तसल्ली देने के लिए वह ख़ुद सशरीर आ पहुँचा। ऑफ़िस का काम निकालकर वह जब-तब आ ही जाया करता था। उसने आँखों में सचमुच के आँसू भरकर कहा कि मैं ही शिंदे की प्राण हूँ, शिंदे की प्रेरणा हूँ। घर-परिवार के अतिरिक्त शिंदे का जो कुछ भी है—और वही तो असली शिंदे है—वह उसने मुझे पूरी तरह सौंप रखा है और तुरंत उसने अपनी बात का प्रमाण पेश कर दिया— मुझे समर्पित किया हुआ अपना नया कविता-संग्रह। हाथ से लिखा हुआ था—‘प्राण को’।
उसकी प्रेरणा और प्राण बनने का हश्र यह हुआ कि वह तो दिन-दूना, रात-चौगना फलता-फूलता रहा। धन-यश, सफलता, मान-सम्मान सभी का मालिक और मैं भीतर-ही-भीतर झुलसकर काठ का कुंदा हो गई। सब ओर से मरी, मुरझाई, टूटी और पस्त! मैं समझ गई कि मैं बुरी तरह ठगी गई हूँ!
धीरे-धीरे उम्र की बढ़ोतरी और ऑफ़िस और दुनियादारी की निरंतर बढ़ती ज़िम्मेदारियों के बीच शिंदे की रोमानी ज़रूरत घटती चली गई। परिणाम यह हुआ कि हमारे बीच चलनेवाले पत्रों की संख्या कम और मज़मून मौसम के सर्द-गर्म होने पर आकर टिक गया। और फिर एक दिन उसके पास से गृह-प्रवेश का निमंत्रण-पत्र मिला। जाने का कोई तुक नहीं था, फिर भी मैं चली गई। महज़ सारी स्थिति का जायज़ा लेने के लिए।
लंबा-चौड़ा आधुनिक ढंग का बना हुआ मकान। लक़-दक़ फ़र्नीचर। बीवी निकलकर आई, तो लगा, यह कोई दूसरी ही औरत है। शरीर पर चर्बी की तीन-चार परतें चढ़ी हुई और परम तृप्ति का एक डकार भाव सारे चेहरे पर पुता हुआ। आठ साल का एक सुंदर-सा बच्चा भी निकलकर आया। लगा, जैसे शिंदे ने ही अपने को पूरी तरह उड़ेल दिया हो उसमें । हू-ब-हू शिंदे।
और मेरा मन हो रहा था कि शिंदे के दोनों कंधे झकझोरकर पूछूँ–राम धुन की तरह ‘तुम मेरी हो, तुम मेरी हो’ की रट लगानेवाले शिंदे साहब, बताइए तो, आपकी ज़िंदगी के इस सारे तामझाम में मैं कहाँ हूँ…मैं कितनी हूँ?
पर पूछकर अब होना ही क्या था? मैं लौट आई, इस एहसास के साथ कि प्रेम के इस खेल में वह एक सधे हुए खिलाड़ी की तरह खेला और मैं निहायत अनाड़ी की तरह। आठ साल तक चलनेवाला यह प्रेम-प्रसंग महज़ एक खिलवाड़ था, जिसकी बाज़ी बड़ी होशियारी से शिंदे ने बाँटी। भ्रमजाल के कटते ही नज़र साफ़ हुई तो बाज़ी में बँटे हुए पत्तों का यह नक़्शा रह-रहकर मेरी आँखों में उभरने लगा :
तुरुप का इक्का यानी घर...उसके पास।
तुरुप का बादशाह यानी बच्चा...उसके पास।
तुरुप की बेगम यानी बीवी और
प्रेम करने के लिए एक प्रेमिका उसके पास
तुरुप का ग़ुलाम यानी नौकर-चाकर
गाड़ी-बंगला उसके पास
लब्बो-लुबाब यह कि तुरुप के सारे पत्ते उसके पास और मुझे मिले उसके दिए हुए छक्के-पंजे, यानी टोटके की तरह पुड़िया में बँधे, दार्शनिक लफ्फ़ाज़ी में लिपटे हवाई प्यार के चंद जुमले। इन टटपूँजिया पत्तों के सहारे मैं ज़्यादा-से-ज़्यादा इतनी ही कर सकती थी कि ज़िंदगी-भर उसकी पूँछ पकड़े रहती और उसे ही अपनी उपलब्धि समझ-समझकर संतोष करती। मन बहुत घबराता, तो उसी पूँछ से हवा करके उसके साथ बिताए मधुर-क्षणों पर जमी समय की धूल उड़ाकर कुछ समय के लिए अपना ख़ालीपन भर लेती।
पर भला बताइए, इससे कहीं ज़िंदगी चल सकती थी? यह तो लाख-लाख शुक्र है ख़ुदा का कि मेरी तहस-नहस ज़िंदगी को नए सिरे से सँवारने के लिए...
लेकिन छोड़िए, इस प्रसंग की कोई ज़रूरत नहीं। निहायत हवाई बातें पल्ले से बाँधे-बाँधे मैंने अपनी ज़िंदगी को बर्बादी के कगार पर ला पटका था। अब चाहती हूँ, ठेठ दुनियादारी की बातें अपनी हज़ार-हज़ार मासूम किशोरी बहिनों के पल्ले से बाँध दूँ, जिससे वे मेरी तरह भटकने से बच जाएँ।
• इस देश में प्रेम का बीज मन और शरीर की पवित्र भूमि में नहीं, ठेठ घर-परिवार की उपजाऊ-भूमि में ही फलता-फूलता है।
• भूलकर भी शादीशुदा आदमी के प्रेम में मत पड़िए। ‘दिव्य’ और ‘महान् प्रेम' की ख़ातिर बीवी-बच्चों को दाँव पर लगानेवाले प्रेम-वीरों की यहाँ पैदावार ही नहीं होती। दो नावों पर पैर रखकर चलनेवाले ‘शूरवीर' ज़रूर सरेआम मिल जाएँगे।
• हाँ, शादीशुदा औरतें चाहें, तो भले ही शादीशुदा आदमी से प्रेम कर लें। जब तक चाहा प्रेम किया, मन भर गया, तो लौटकर अपने खूटे पर।
• न कोई डर, न घोटाला, जब प्रेम में लगा हो, शादी का ताला!
- पुस्तक : प्रतिनिधि कहानियाँ (पृष्ठ 81)
- रचनाकार : मन्नू भंडारी
- प्रकाशन : राजमकल फ्रकाशन
- संस्करण : 2022
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