यह बिल्कुल ही सत्य बात है कि मन में जभी दूसरे के दोष देखने की प्रवृत्ति आती है, तभी वे दोष तुम्हारे अंदर आकर घर बना लेते हैं। तभी बिना कालविलंब किए, उस पाप-प्रवृत्ति को तोड़-मरोड़ एवं झाड़-बुहार कर साफ़ कर देने में निस्तार है, नहीं तो सब नष्ट हो जाएगा।
अनुवाद :
श्रीरामनंदन प्रसाद