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कुँवर नारायण के उद्धरण

वस्तुवादी यथार्थ-बोध के मतलब हैं, समय के वस्तुओं की अपेक्षा बीतने और समाप्त हो जाने का एहसास। यह चीज़ों की मृत्यु और त्रासदी का एहसास भी है।