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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

शब्द अर्थ के द्वारा चारों ओर से बँधा रहता है, कवि जब उसे मुक्ति देता है तब वह भ्रमर की तरह गुंजन करता हुआ हृदयपद्म की पंखुड़ियाँ खोलने के लिए अपनी वेदना का ज्ञान कराता है, तब वह सिर्फ़ शब्द नहीं रह जाता है और व उसका अभिधान द्वारा पुष्ट वह अर्थ ही रहता है।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी