सांस्कृतिक भावों को ग्रहण करने के लिए, बुलंदी, बारीकी और ख़ूबसूरती को पहचानने के लिए—उस असलियत को पाने के लिए जिसका नक़्शा साहित्य में रहना है—सुनने या पढ़नेवाले की कुछ स्थिति अपेक्षित होती है—वह स्थिति है उसकी शिक्षा, उसके मन का सांस्कृतिक परिष्कार।