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जयशंकर प्रसाद के उद्धरण

संसार नित्य यौवन और ज़रा के चक्र में घूमता है, परंतु मानव-जीवन में तो एक ही बार यौवनोन्माद का प्रवेश होता है, जिसमें अनुबंध का प्रत्याख्यान और स्नेह का आलिंगन भरा रहता है।