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कुँवर नारायण के उद्धरण

साहित्य जहाँ जीवन की मात्र व्यावसायिक चेष्टा न होकर; सर्वप्रथम उसके कला-पक्ष की अभिव्यक्ति है, वहाँ साहित्य और जीवन का संबंध दूसरा होगा। रचा जाने के बाद साहित्य भी उसी जीवन का यथार्थ एवं घनिष्ठ अंग बन जाता है, जिससे वह उत्पन्न होता है।