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लीलाधर जगूड़ी के उद्धरण

रवि की तरह कवि को भी सब जगह बिना घृणा के जाने, रहने और सहने का तजुर्बा और साहस होना चाहिए। लाचारी और मजूबरीवश ऐसा होना कवि की अयोग्यता है। सोच-समझकर, जान-बूझकर, जिज्ञासु भाव से ऐसा हो, तो वह अपने कवि के निर्माण में बेहतर सहायक हो सकता है।