मुक्तिबोध की भाषा किसी पुराने पोख़्ता खंडहर की दीवार सरीख़ी है। भारी, बुलंद किंतु प्रतिध्वनि से हीन, किंतु जहाँ कहीं उस पोख़्ता और उबाऊ और प्रतिध्वनि-हीन भाषा में, पत्थर-सी बेजान भाषा में, आज के आदमी की बातचीत की भाषा आ गई है, वहीं से लगता है ईंटें जगह-जगह गल गई है और दीवारों में झिर्रियाँ बन गई है, जिन से घने अँधेरे में भी प्रकाश झर रहा है और यही उसकी बुनियादी सहजता है—यह प्रकाश ही अर्थ है।