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गणेश शंकर विद्यार्थी के उद्धरण

मनुष्य की स्वाधीन आत्मा ने, ठोकरों से कुचले हुए साँप की तरह फुफकार मार-मार कर; पराधीन शरीर को भले ही छोड़ दिया है, पर अपने स्वत्वों का अपहरण कभी सहन नहीं किया।