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वेंकी रामकृष्णन के उद्धरण

मैं जिस भारत में बड़ा हुआ; वह कई धमों की धरती है और ऐसा कोई समय दिखाई नहीं देता, जब कोई-न-कोई वर्ग उपवास न कर रहा हो।

अनुवाद : अमित कुश