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गणेश शंकर विद्यार्थी के उद्धरण

लोकरुचि अथवा लोक-उक्तियों के अनुसार जो अपना जीवन-यापन करते हैं, वे अपने पड़ोसियों की प्रशंसा के पात्र भले ही बन जाएँ, पर उनका जीवन औरों के लिए नहीं होता है।