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गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

कवि केवल रचना-प्रक्रिया में पड़कर ही कवि नहीं होता, वरन उसे वास्तविक जीवन में अपनी आत्म-समृद्धि को प्राप्त करना पड़ता है, और मनुष्यता के प्रधान लक्ष्यों से एकाकर होने की क्षमता को विकसित करते रहना पड़ता है।