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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

कर्म में मेरी आकांक्षा नहीं है, विश्राम एवं शांति के लिए मैं लालायित हूँ। स्थान और काल का तत्त्व मुझसे यद्यपि छिपा हुआ नहीं है, फिर भी मेरा भाग्य तथा कर्मफल मुझे निरंतर कर्म की ही ओर ले जा रहा है।