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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

ज्योंही मैं अपने को एक क्षुद्र देह समझ बैठता हूँ, त्योंही मैं संसार के अन्यान्य शरीरों के सुख-दुःख की कोई परवाह न करते हुए, अपने शरीर की रक्षा में उसे सुंदर बनाने के प्रयत्न में लग जाता हूँ।