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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

जो शब्द की ही उलझन में अधिक पड़े रहते हैं और अपने मन को शब्दों की शक्ति में ही दौड़ाया करते हैं, वे भाव को खो बैठते हैं।

अनुवाद : पण्डित द्वारकानाथ तिवारी