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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

जितने दिनों तक तुम्हारे शरीर और मन में व्यथा लगती है, उतने दिनों तक तुम एक चींटी की भी व्यथा के निराकरण की ओर चेष्टा रखो। और ऐसा यदि नहीं करते हो, तो तुमसे बढ़कर हीन और कौन है?

अनुवाद : श्रीरामनंदन प्रसाद