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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

जिस प्रकार जगत् अनेक रूपात्मक है, उसी प्रकार हमारा हृदय भी अनेक भावात्मक है। इन अनेक भावों का व्यायाम और परिष्कार तभी समझा जा सकता है; जबकि इस सबका प्रकृत सामंजस्य, जगत् के भिन्न-भिन्न रूपों, व्यापारों या तथ्यों के साथ हो जाए।