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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्री अलंकार लादकर सुंदर नहीं हो सकती, उसी प्रकार प्रस्तुत वस्तु या तथ्य की रमणीयता के अभाव में, अलंकारों का ढेर काव्य का सजीव स्वरूप नहीं खड़ा कर सकता।