जिनके भीतर सत्त्व की ज्योति अत्यंत क्षीण या मंद होती है, जिन्हें धर्म के सौंदर्य का साक्षात्कार नहीं होता, जिनका मन कर्म की भावना में न लगकर फल की ही भीवना में लगता है, वे इसी स्वर्ग की कामना से बहुत से गिनाए हुए पुण्यकार्य, बिना उनके संपादन का प्रकृत्त सुख अनुभव किए यों ही रूखे ढंग से करते पाए जाते हैं।