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विश्वनाथ त्रिपाठी के उद्धरण

जटिल परिस्थितियाँ रचनाधर्मिता के अनुशासन में बँधती हैं। वे कल्पना की समाहार शक्ति द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत होकर सहृदय के चित्त में पुनः बिखर जाती हैं, यानी अपने मूल रूप में आ जाती हैं।