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विश्वनाथ त्रिपाठी के उद्धरण

जब तक स्त्री; पुरुष के साथ व्यापक जीवनक्षेत्र में नहीं उतरती, तब तक वह सच्चे स्वाभाविक प्रेम की अधिकारिणी नहीं बन सकती।