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श्रीमद् राजचंद्र के उद्धरण

जहाँ सुपात्र जीव को प्रत्यक्ष सद्‌गुरु का सानिध्य प्राप्त न हो, वहाँ आत्मादि अस्तित्व के निरुपक शास्त्र आधारभूत हैं।