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श्रीमद् राजचंद्र के उद्धरण

जब सारा जगत झूठन समान अथवा स्वप्न समान जानने में आए, तब ज्ञानीपना प्रगट हुआ—ऐसा कहा जाता है। इनके अतिरिक्त सभी को कहने मात्र का ज्ञान है।