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गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

ज्ञान या तो कर्म सम्भूत जीवंत ज्ञान है, अथवा वह ज्ञान-परंपरा और भाव-परंपरा—जो बाह्य सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन-जगत् का ही एक अंग है—से हमें प्राप्त होता है।