एक दूसरे प्रकार की आंतरिक प्रतिक्रिया तब शुरू होती है, जब भावनानुभूति के नाम पर हम उन्हीं भावनाओं को दुहराते हैं जो निष्प्राण हो गई हैं, जहाँ जीवन की गति कुंठित हो गई है। इस प्रकार साहित्य में बासीपन की उत्पत्ति होती है, जिसके विरुद्ध प्रतिक्रिया फ़ौरन शुरू हो जाती है, क्योंकि जीवन एक जगह रुका नहीं रह सकता।