दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक कोटि तो उन लोगों की हैं, जो दृढ़ स्नायुओं वाले, शांत तथा प्रकृति के अनुरूप आचरण करने वाले होते हैं; वे अधिक कल्पनाशील नहीं होते, फिर भी अच्छे, दयालु, सौम्य आदि होते हैं—दुनिया ऐसे लोगों के लिए ही है, वे ही सुखी रहने के लिए पैदा हुए हैं। दूसरी कोटि उन लोगों की है, जिनके स्नायु अधिक तनाव के हैं, जिनमें प्रगाढ़ भावना है, जो अत्यधिक कल्पनाशील हैं, सदा एक क्षण में बहुत ऊँचे चले जाते हैं और दूसरे क्षण नीचे उतर आते हैं—उनके लिए सुख नहीं। प्रथम कोटि के लोगों को सुख-काल प्रायः सम होता है और द्वितीय कोटि के लोगों को हर्ष-विषाद के द्वंद्व में जीवन व्यतीत करना पड़ता है। किंतु इसी द्वितीय कोटि में ही उन लोगों का आविर्भाव होता है, जिन्हें हम प्रतिभासंपन्न कहते हैं। इस हाल के सिद्धांत में कुछ सत्य है कि 'प्रतिभा एक प्रकार का पागलपन है।'