दर्शनशास्त्र के मत में एक ऐसा आनंद है, जो निरपेक्ष और अपरिणामी है। वह आनंद हमारे ऐहिक सुखोपभोग के समान नहीं है, तो भी वेदांत प्रमाणित करता है कि इस जगत् में जो कुछ आनंदकारी है; वह उसी यथार्थ आनंद का अंश मात्र है, क्योंकि एकमात्र उस आनंद का ही वास्तविक अस्तित्व है।