धर्म को जानने का अर्थ है, विषय के मूल कारण को जानना और वही जानना ज्ञान है। उस मूल के प्रति अनुरक्ति ही है भक्ति, और भक्ति के तारतम्यानुसार ही ज्ञान का भी तारतम्य होता है। जितनी अनुरक्ति से जितना जाना जाता है, भक्ति और ज्ञान भी उतना ही होता है।
अनुवाद :
श्रीरामनंदन प्रसाद