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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

'चंद्रोदय देखकर' अहा कितना सुंदर है, ऐसा न कहने वाले लोग कम ही हैं, किंतु, उन सभी को चाँद की माधुरी नहीं मिल पाती है।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी