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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

चढ़ते यौवन में जब शिल्प का अभिसार पथ-विपथ में होता हुआ चलता है, उस समय का इतिहास अत्यंत जटिल, बड़ा रहस्यमय, बहुत अस्थिर होता है।