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कुँवर नारायण के उद्धरण

अध्ययन द्वारा ही हमारी साहित्यिक रुचि का परिष्कार होता है, जिसके बिना हम उस प्रौढ़ साहित्यिक विवेक को नहीं पा सकते, जिसका मौलिकता से विशेष संबंध है।