स्वयं प्रकाश की कहानियाँ
नेताजी का चश्मा
हालदार साहब को हर पंद्रहवें दिन कंपनी के काम के सिलसिले में उस क़स्बे से गुज़रना पड़ता था। क़स्बा बहुत बड़ा नहीं था। जिसे पक्का मकान कहा जा सके वैसे कुछ ही मकान और जिसे बाज़ार कहा जा सके वैसा एक ही बाज़ार था। क़स्बे में एक लड़कों का स्कूल, एक लड़कियों का स्कूल,