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सत्यनारायण कविरत्न

1879 - 1918 | अलीगढ़, उत्तर प्रदेश

भारतेंदु युग के कवि। ब्रजभाषा काव्य-परंपरा के अंतिम कवियों में से एक।

भारतेंदु युग के कवि। ब्रजभाषा काव्य-परंपरा के अंतिम कवियों में से एक।

सत्यनारायण कविरत्न की संपूर्ण रचनाएँ

कविता 1

 

दोहा 13

चित चिंता तजि, डारिकैं, भार, जगत के नेम।

रे मन, स्यामा-स्याम की, सरन गहौ करि प्रेम॥

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मकराकृत कुंडल स्रवन, पीतवरन तन ईस।

सहित राधिका मो हृदय, बास करो गोपीस॥

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पीतपटी लपटाय कैं, लैं लकुटी अभिराम।

बसहु मंद मुसिक्याय उर, सगुन-रूप घनस्याम॥

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श्रीराधा वृषभानुजा, कृष्ण-प्रिया हरि-सक्ति।

देहु अचल निज पदन की, परमपावनी भक्ति॥

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सजल सरल घनस्याम अब, दीजै रस बरसाय।

जासों ब्रजभाषा-लता, हरी-भरी लहराय॥

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पद 8

रोला छंद 1

 

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