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कविराजा बाँकीदास

1771 - 1833 | बाड़मेर, राजस्थान

डिंगल भाषा के श्रेष्ठ कवि। वीर रस से ओत-प्रोत काव्य के लिए उल्लेखनीय।

डिंगल भाषा के श्रेष्ठ कवि। वीर रस से ओत-प्रोत काव्य के लिए उल्लेखनीय।

कविराजा बाँकीदास की संपूर्ण रचनाएँ

दोहा 11

सूर पूछे टीपणौ, सुकन देखै सूर।

मरणां नू मंगळ गिणे, समर चढे मुख नूर॥

शूरवीर ज्योतिषी के पास जाकर युद्ध के लिए मुहूर्त नहीं पूछता, शूर शकुन नहीं देखता। वह मरने में ही मंगल समझता है और युद्ध में उनके मुँह पर तेज चमक

आता है।

तीहाँ देस विदेस सम, सीहाँ किसा उतन्न।

सीह जिकै वन संचरै, को सीहाँरौ वन्न॥

सिंहों के लिये देश-विदेश बराबर हैं। उनका वतन कैसा? सिंह जिन वनों मे पहुँच जाते हैं वे वन ही उनके अपने स्वदेश हो जाते हैं।

सूरातन सूराँ चढ़े, सत सतियाँसम दोय।

आडी धारा ऊतरै, गणे अनळ नू तोय॥

शूरवीरों में वीरत्व चढ़ता है और सतियो में सतीत्व। ये दोनों एक समान है। शूरवीर

तलवार से कटते हैं और सती अग्नि को जल समझती है।

कापुरसाँ फिट कायराँ, जीवण लालच ज्ययाँह।

अरि देखै आराण मै, तृण मुख माँझळ त्याँह॥

कुपुरुष कायरों को धिक्कार है, जो जीने के लोभ से शत्रु को युद्ध में देखते ही मुँह में तिनका ले लेते हैं।

चमर हुळे नह सीह सिरै, छत्र धारे सीह।

हांथळ रा बळ सू हुवौ, मृगराज अबीह॥

सिंह के सिर पर चँवर नहीं डुलाये जाते और सिंह कभी मस्तक पर छत्र धारण नहीं करता। वह तो अपने पंजे के बल से ही निर्भय हुआ है।

पुस्तकें 1

 

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